कभी कभी जीवन मे ऐसी स्थिति आती है की आपस मे बात किये बिना काम नहीं चलता और बोलो तो दिमाग नहीं चलता उसी समय केलिए ये कविता है जो स्वयम को ही समर्पित है
ऐसी बात चीत से तो खामोसी बेहतर है
क्युकी दर्देदिल पर हर दबा बे अशर है
चाँद छूने की चाहत सर है
आस्मां पर मेरीनजर है
पर जमीन पर मेरा घर है
दर्देदिल पर हर दबा बे अशर है
गाव रोता रहा मुझे आवाज देकर
खुद कोखोता रहा मे शहर आ कर
पर समय चलता रहा पंखा लगा कर
दर्देदिल पर हर दबा बे अशर है
दिल मे अभी कुछ अरमान बाकी है
इस मैकदे मैमेरा भी एक शाकी है
खली जम लिए अब ताक्नी उसकी डगर है
दर्दे दिलपर हर दबा बे अशर है
Monday, February 27, 2012
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