क्या रावन अवध्य है ?


रावण ...एक ऐसा नाम जिसे हम बचपन से सुनते आ रहे है और ये घृणा और बुरे का पर्याय है हम सभी के लिए ...पर क्या आज सिर्फ एक पोरानिक रावन को हर साल पैदा करना और फिर मारना जरुरी है ..

आज समाज में हर तरफ रावन ही रावन है ....अगर हम राम चरित मानस का गहराई से अध्यन करे तो हमें पता चलेगा की भगवान शिव ने कितने लोगो को रावन की श्रेणी मई डाला है ।

सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।।
नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।।
कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया।
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा।।
मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।।
जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।

आज हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है की इन दैनिक रावनो को पहचान कर भगवान का सहारा मन मई बैठा कर विरोध करे ...विनाश तो हो सकता है हम और आप न कर सके पर विरोध तो कर सकते है ।

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