Official Blog of Ambrish Shrivastava

Sunday, May 9, 2021

कोरोना से बचाव कैसे करें

प्रश्न (1) :- क्या कोरोना वायरस को ख़त्म किया जा सकता है
उत्तर:- नहीं! कोरोना वायरस एक निर्जीव कण है जिस पर चर्बी की सुरक्षा-परत चढ़ी हुई होती है। यह कोई ज़िन्दा चीज़ नहीं है, इसलिये इसे मारा नहीं जा सकता बल्कि यह ख़ुद ही रेज़ा-रेज़ा (कण-कण) होकर ख़त्म होता है।

प्रश्न( 02):-. कोरोना वायरस के विघटन (रेज़ा-रेज़ा होकर ख़त्म होने) में कितना समय लगता है?
उत्तर:- कोरोना वायरस के विघटन की मुद्दत का दारोमदार, इसके आसपास कितनी गर्मी या नमी है? या जहाँ ये मौजूद है, उस जगह की परिस्थितियां क्या हैं? इत्यादि बातों पर निर्भर करता है।

प्रश्न(03):-. इसे कण-कण में कैसे विघटित किया जा सकता है?
उत्तर:- कोरोना वायरस बहुत कमज़ोर होता है। इसके ऊपर चढ़ी चर्बी की सुरक्षा-परत फाड़ देने से यह ख़त्म हो जाता है। ऐसा करने के लिये साबुन या डिटर्जेंट के झाग सबसे ज़्यादा प्रभावी होते हैं। 20 सेकंड या उससे ज़्यादा देर तक साबुन/डिटर्जेंट लगाकर हाथों को रगड़ने से इसकी सुरक्षा-परत फट जाती है और ये नष्ट हो जाता है। इसलिये अपने शरीर के खुले अंगों को बार-बार साबुन व पानी से धोना चाहिये, ख़ास तौर से उस वक़्त जब आप बाहर से घर में आए हों।

प्रश्न(04):- क्या गरम पानी के इस्तेमाल से इसे ख़त्म किया जा सकता है?
उत्तर:- हाँ! गर्मी चर्बी को जल्दी पिघला देती है। इसके लिये कम से कम 25 डिग्री गर्म (गुनगुने से थोड़ा तेज़) पानी से शरीर के अंगों और कपड़ों को धोना चाहिये। छींकते या खाँसते वक़्त इस्तेमाल किये जाने वाले रुमाल को 25 डिग्री या इससे ज़्यादा गर्म पानी से धोना चाहिये। गोश्त, चिकन या सब्ज़ियों को भी पकाने से पहले 25 डिग्री तक के पानी में डालकर धोना चाहिये।

प्रश्न(05):- क्या एल्कोहल मिले पानी (सैनीटाइजर) से कोरोना वायरस की सुरक्षा-परत को तोड़ा जा सकता है?
उत्तर:- हाँ! लेकिन उस सैनीटाइजर में एल्कोहल की मात्रा 65 पर्सेंट से ज़्यादा होनी चाहिये तभी यह उस पर चढ़ी सुरक्षा-परत को पिघला सकता है, वरना नहीं।

प्रश्न(06):-क्या ब्लीचिंग केमिकल युक्त पानी से भी इसकी सुरक्षा-परत तोड़ी जा सकती है?
उत्तर:- हाँ! लेकिन इसके लिये पानी में ब्लीच की मात्रा 20% होनी चाहिये। ब्लीच में मौजूद क्लोरीन व अन्य केमिकल कोरोना वायरस की सुरक्षा-परत को तोड़ देते हैं। इस ब्लीचिंग-युक्त पानी का उन सभी जगहों पर स्प्रे करना चाहिये जहाँ-जहाँ हमारे हाथ लगते हैं। टीवी के रिमोट, लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन को भी ब्लीचिंग-युक्त पानी में भिगोकर निचोड़े गये कपड़े से साफ़ करना चाहिये।

प्रश्न(07):-क्या कीटाणुनाशक दवाओं के द्वारा कोरोना वायरस को ख़त्म किया जा सकता है?
उत्तर:- नहीं! कीटाणु सजीव होते हैं इसलिये उनको एंटीबायोटिक यानी कीटाणुनाशक दवाओं से ख़त्म किया जा सकता है लेकिन वायरस निर्जीव कण होते हैं, इन पर एंटीबायोटिक दवाओं का कोई असर नहीं होता। यानी कोरोना वायरस को एंटीबायोटिक दवाओं से ख़त्म नहीं किया जा सकता।

प्रश्न(08):-कोरोना वायरस किस जगह पर कितनी देर तक बाक़ी रहता है?
उत्तर:-
० कपड़ों पर : तीन घण्टे तक
० तांबा पर : चार घण्टे तक
० कार्डबोर्ड पर : चौबीस घण्टे तक
० अन्य धातुओं पर : 42 घण्टे तक
० प्लास्टिक पर : 72 घण्टे तक
इस समयावधि के बाद कोरोना वायरस ख़ुद-ब-ख़ुद विघटित हो जाता है। लेकिन इस समयावधि के दौरान किसी इंसान ने उन संक्रमित चीज़ों को हाथ लगाया और अपने हाथों को अच्छी तरह धोये बिना नाक, आँख या मुंह को छू लिया तो वायरस शरीर में दाख़िल हो जाएगा और एक्टिव हो जाएगा।

प्रश्न(09):-क्या कोरोना वायरस हवा में मौजूद हो सकता है? अगर हाँ तो ये कितनी देर तक विघटित हुए बिना रह सकता है?
उत्तर:- जिन चीज़ों का सवाल न. 08 में ज़िक्र किया गया है उनको हवा में हिलाने या झाड़ने से कोरोना वायरस हवा में फैल सकता है। कोरोना वायरस हवा में तीन घण्टे तक रह सकता है, उसके बाद ये ख़ुद-ब-ख़ुद विघटित हो जाता है।

प्रश्न(10):-किस तरह का माहौल कोरोना वायरस के लिये फायदेमंद है और किस तरह के माहौल में वो जल्दी विघटित होता है?
उत्तर:- कोरोना वायरस क़ुदरती ठण्डक या AC की ठण्डक में मज़बूत होता है। इसी तरह अंधेरे और नमी (Moisture) वाली जगह पर भी ज़्यादा देर तक बाक़ी रहता है। यानी इन जगहों पर जल्दी विघटित नहीं होता। सूखा, गर्म और रोशनी वाला माहौल कोरोना वायरस के जल्दी ख़ात्मे में मददगार है। इसलिये जब तक इसका प्रकोप है तब तक AC या एयर कूलर का इस्तेमाल न करें।

प्रश्न(11):-सूरज की तेज़ धूप का कोरोना वायरस पर क्या असर पड़ता है?
उत्तर:- सूरज की धूप में मौजूद अल्ट्रावायलेट किरणें कोरोना वायरस को तेज़ी से विघटित कर देती है यानी तोड़ देती है क्योंकि सूरज की तेज़ धूप में उसकी सुरक्षा-परत पिघल जाती है। इसीलिये चेहरे पर लगाए जाने वाले फेसमास्क या रुमाल को अच्छे डिटर्जेंट से धोने और तेज़ धूप में सुखाने के बाद दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

प्रश्न(12):-क्या हमारी चमड़ी (त्वचा) से कोरोना वायरस शरीर में जा सकता है?
उत्तर:- नहीं! तंदुरुस्त त्वचा से कोरोना संक्रमण नहीं हो सकता। अगर त्वचा पर कहीं कट लगा है या घाव है तो इसके संक्रमण की संभावना है।

प्रश्न(13):-क्या सिरका मिले पानी से कोरोना वायरस विघटित हो सकता है?
उत्तर:- नहीं! सिरका कोरोना वायरस की सुरक्षा-परत को नहीं तोड़ सकता। इसलिये सिरका वाले पानी से हाथ-मुंह धोने से कोई फ़ायदा नहीं है।

नोट-- कपड़ा, दरवाजा, घंटी का बटन, जूता चप्पल,थैला, गाड़ी का हेंडल, चाबी, गिलास, सब्जी, फल, मुद्रा, आदि बाहरी संपर्क में आने के बाद आंख, कान, नाक,मुंह को ना छुए। नमक मिला गरम पानी से गरारा जरूर करे, चाय या काफी याफ़ गरम पानी पीते रहे, कोरोना प्रवेश कर भी जाये तो श्वसन तक पहुच नही पायेगा और आप सुरक्षित रहेंगे।

पढ़ने हेतु आभार लेकिन अमल करेंगे तब ही सुरक्षित रहेंगे,अपने दुश्मन व मित्र आप स्वयं है, याने लापरवाही कतई ना करे। हर सदस्य सुरक्षित रहे,समाज को आपकी आवश्यकता है, आप सबके दीर्घायु व कुशलता की कामना करता हूँ।

Sunday, April 11, 2021

भारत के बाहर माता के शक्ति पीठ

बहुत से दो धर्मो के लोगो की एकता पर बहुत बल देते है, वर्तमान में ये मंदिर उन देशो में स्थित है जहाँ कभी हमारे धर्म के लोग रहते थे, लेकिन आज हमारे धर्म का नाम बिलकुल खत्म हो गया है बस माता के मंदिर के रूप में निशानी रह गयी है, उसे भी मिटाने की बहुत कोश्शि की गयी होगी लेकिन जैसा की हम भगवान की शक्ति से संरक्षित है वैसे ही ये मंदिर भी, अभी भी समय है अपने धर्म की रक्षा करिये नहीं तो अवशेष ही बचेंगे वो भी सिर्फ वो वाले जो मिटाये न जा सके।

अफगानिस्तान में हैं माता आसमाई देवी

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में आसा पहाड़ी पर मां शक्ति का मंदिर स्थित है। यह मंदिर आसमाई माता के नाम से जाना जाता है। आसमाई रूप से अपने भक्तों की हर मुराद को पूरा करती हैं इसलिए इनको आसमाई कहा जाता है। मां के नाम पर पहाड़ी का नाम आसा पहाड़ी रखा गया। आसमाई मां के मंदिर में कई हिंदू देवी-देवताओं की मूर्ति हैं।

मंदिर के पास मौजूद है चमत्कारिक शिला

मंदिर के पास में ही एक बड़ी शिला मौजूद है, जिसे पंजसीर का जोगी के नाम से जाना जाता है। इस शिला को लेकर एक कथा भी है। कथा के अनुसरा, 152 साल पहले एक जोगी इस पहाड़ी पर तपस्या कर रहा था लेकिन उसको स्थानीय लोगों ने बहुत परेशान किया। इससे वह शिला के रूप में परिवर्तित हो गया और मां के चरणों में स्थापित हो गया। तब इस शिला को उनके नाम से ही पुकारा जाता है। अफगानिस्तान के मौजूदा हालात के बारे में तो सभी जानते हैं। वहां तालिबान और आतंकियों की वजह से नागरिक भी सुरक्षित नही हैं। तालिबान द्वारा बुद्ध की ऐतिहासिक प्रतिमा को तोड़ने की खबर पूरे विश्व में चर्चा का विषय बन गई थी। ऐसे में दुर्गा मां मंदिर का होना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। वहां आसमाई देवी आसा माई के नाम से भी जानी जाती हैं।


 

माता के नाम पर पड़ा बाग्लादेश के इस शहर का नाम

अफगानिस्तान के बाद बांग्लादेश में भी मां भगवती का मंदिर शक्तिपीठ के रूप में मौजूद है। बांग्लादेश में एक नहीं बल्कि पांच शक्तिपीठ मौजूद हैं। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में माता ढाकेश्वरी देवी का मंदिर स्थित है, जिनके नाम पर इस शहर का नाम ढाका रखा गया। पीएम मोदी ने अपनी यात्रा के दौरान इस मंदिर के दर्शन किए थे। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, माता सती के यहां आभूषण गिरे थे। इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में सेन वंश के राजा बल्लाल सेन ने करवाया था।


 

बाग्लादेश मौजूद हैं ये शक्तिपीठ

बांग्लादेश में सुंगध नदी के तट पर उग्रतारा देवी की शक्तिपीठ है, यहां माता सति की नासिका गिरी थी। यहां देवी सुनंदा के साथ भैरव त्रयम्बक हैं। इसके साथ ही करतोयाघाट शक्तिपीठ भी यहां मौजूद है, यहां माता सति का वाम तल्प गिरा था। यहां देवी अर्पणा रूप में मौजूद हैं और शिव वामन भैरव के रूप में विराजमान हैं।


 

बांग्लादेश में यहां गिरी थी माता सती की हथेली

बांग्लादेश के चट्टल गांव में चट्टल भावनी शक्तिपीठ मौजूद है, यहां माता सति का दाहिना बाहु यानी भुजा गिरा था। यहां मां भवानी के साथ भैरव चंद्रशेखर मौजूद हैं। अंत में यशोर शक्तिपीठ भी यहां मौजूद है। माता सति का यहां बायीं हथेली गिरी थी। यहां माता शक्ति यशोरेश्वरी के साथ भैरव चंद्र मौजूद हैं।


 

इस देश में ज्योत रूप में मौजूद हैं मां

अजरबैजान नाम के मुस्लिम देश में भी मां दुर्गा शक्ति रूप में विराजमान हैं। अजरबैजान में 98 फीसदी से ज्यादा आबादी मुस्लिमों की है। यहां मां भगवती का बहुत प्राचीन मंदिर मौजूद है, जिसे टेम्पल ऑफ फायर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर अजरबैजान के सुराखानी नामक जगह पर स्थित है। इस मंदिर में एक ज्वाला जलती रहती है और पास में मां का त्रिशुल भी मौजूद है। मां इस मंदिर में ज्योत रूप में विराजमान हैं। मां के मंदिर की दिवार पर गुरुमुखी लिपी शब्दों का इस्तेमाल किया गया है।


 

हिंदू व्यापारियों ने बनवाया था यह मंदिर

माना जाता है कि सौ साल पहले भारत के एक हिंदू व्यापारी ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। कुछ इतिहास के जानकारों का मानना है कि मंदिर का निर्माण बुद्धदेव ने करवाया था, जो कुरुक्षेत्र के गांव में निवास करते हैं। मंदिर में संवत् 1783 में इसका उल्लेख किया गया है। वहीं कुछ अन्य जानकारी के अनुसार, उत्तमचंद और शोभराज ने मंदिर निर्माण में महान भूमिक निभाई थी। 


जब हिंदू व्यापारी इस रास्ते गुजरते थे, तब वह यहां माथा जरूर टेकते थे। यहां पहले भारतीय पुजारी पूजा करते थे लेकिन 1860 में तुगलकी फरमान के बाद यहां से भारतीय पुजारी चले गए। तब से यह मंदिर विरान पड़ा है, इस मंदिर में अब कोई भी नहीं आता।

पाकिस्तान में भी है शक्तिपीठ

पाकिस्तान में भी मां दुर्गा का शक्तिपीठ मौजूद है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, यहां पर देवी सती का ब्रह्मरंध्र (मस्तिष्क) गिरा था। यह मंदिर हिंगलाज देवी के रूप में प्रसिद्ध है, यहां भगवान शिव भैरव भीमलोचन के रूप में विराजमान हैं। इस मंदिर को हिंगुला देवी और नानी का मंदिर या नानी का हज के रूप में जाना जाता है। भारत में जो महत्व वैष्णो देवी का है, पाकिस्तान में वही महत्व हिंगलाज माता का है। 


माना जाता है कि हिंगलाज माता के दर्शन मात्र से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। भगवान राम ने भी यहां रावण के वध के बाद ब्रह्महत्या के पाप मुक्ति के लिए यज्ञ किया था और मां से प्रार्थना की थी।

Special Thanks to https://navbharattimes.indiatimes.com/astro/dharam-karam/religion-and-spiritualism/know-about-maa-durga-devi-temples-in-muslim-countries-in-shardiya-navratri-86783/9/

100 facts everyone should know

1.योग,भोग और रोग ये तीन अवस्थाएं हैं।
2. लकवा - सोडियम की कमी के कारण होता है ।
3. हाई बी पी में - स्नान व सोने से पूर्व एक गिलास जल का सेवन करें तथा स्नान करते समय थोड़ा सा नमक पानी में डालकर स्नान करें ।
4. लो बी पी - सेंधा नमक डालकर पानी पीयें ।
5. कूबड़ निकलना- फास्फोरस की कमी ।
6. कफ - फास्फोरस की कमी से कफ बिगड़ता है , फास्फोरस की पूर्ति हेतु आर्सेनिक की उपस्थिति जरुरी है, गुड़ व शहद खाएं । 7. दमा, अस्थमा - सल्फर की कमी ।
8. सिजेरियन आपरेशन - आयरन , कैल्शियम की कमी ।
9. सभी क्षारीय वस्तुएं दिन डूबने के बाद खायें ।
10. अम्लीय वस्तुएं व फल दिन डूबने से पहले खायें ।
11. जम्भाई- शरीर में आक्सीजन की कमी ।
12. जुकाम - जो प्रातः काल जूस पीते हैं वो उस में काला नमक व अदरक डालकर पियें ।
13. ताम्बे का पानी - प्रातः खड़े होकर नंगे पाँव पानी ना पियें ।
14. किडनी - भूलकर भी खड़े होकर गिलास का पानी ना पियें 15. गिलास एक रेखीय होता है तथा इसका सर्फेसटेन्स अधिक होता है । गिलास अंग्रेजों ( पुर्तगाल) की सभ्यता से आयी है अतः लोटे का पानी पियें, लोटे का कम सर्फेसटेन्स होता है ।
16. अस्थमा, मधुमेह, कैंसर से गहरे रंग की वनस्पतियाँ बचाती हैं ।
17. वास्तु के अनुसार जिस घर में जितना खुला स्थान होगा उस घर के लोगों का दिमाग व हृदय भी उतना ही खुला होगा ।

मनुष्य की जीवन शैली

18. परम्परायें वहीँ विकसित होंगी, जहाँ जलवायु के अनुसार व्यवस्थायें विकसित होगीं ।
19. पथरी - अर्जुन की छाल से पथरी की समस्यायें ना के बराबर है ।
20. RO का पानी कभी ना पियें, यह गुणवत्ता को स्थिर नहीं रखता ।
कुएँ का पानी पियें ।
बारिश का पानी सबसे अच्छा, पानी की सफाई के लिए सहिजन की फली सबसे बेहतर है ।
21. सोकर उठते समय हमेशा दायीं करवट से उठें या जिधर का स्वर चल रहा हो, उधर करवट लेकर उठें ।
22. पेट के बल सोने से हर्निया, प्रोस्टेट, एपेंडिक्स की समस्या आती है ।
23. भोजन के लिए पूर्व दिशा, पढ़ाई के लिए उत्तर दिशा बेहतर है ।
24. HDL बढ़ने से मोटापा कम होगा LDL व VLDL कम होगा ।
25. गैस की समस्या होने पर भोजन में अजवाइन मिलाना शुरू कर दें ।
26. चीनी के अन्दर सल्फर होता जो कि पटाखों में प्रयोग होता है , यह शरीर में जाने के बाद बाहर नहीं निकलता है।
चीनी खाने से पित्त बढ़ता है ।
27. शुक्रोज हजम नहीं होता है फ्रेक्टोज हजम होता है और भगवान् की हर मीठी चीज में फ्रेक्टोज है ।
28. वात के असर में नींद कम आती है ।
29. कफ के प्रभाव में व्यक्ति प्रेम अधिक करता है ।
30. कफ के असर में पढ़ाई कम होती है ।
31. पित्त के असर में पढ़ाई अधिक होती है ।
33. आँखों के रोग - कैट्रेक्ट, मोतियाबिंद, ग्लूकोमा , आँखों का लाल होना आदि ज्यादातर रोग कफ के कारण होता है ।
34. शाम को वात-नाशक चीजें खानी चाहिए ।
35. प्रातः 4 बजे जाग जाना चाहिए ।
36. सोते समय रक्त दबाव सामान्य या सामान्य से कम होता है ।
37. व्यायाम - वात रोगियों के लिए मालिश के बाद व्यायाम , पित्त वालों को व्यायाम के बाद मालिश करनी चाहिए ।
कफ के लोगों को स्नान के बाद मालिश करनी चाहिए ।
38. भारत की जलवायु वात प्रकृति की है, दौड़ की बजाय सूर्य नमस्कार करना चाहिए ।
39. जो माताएं घरेलू कार्य करती हैं, उनके लिए व्यायाम जरुरी नहीं ।
40. निद्रा से पित्त शांत होता है, मालिश से वाय शांति होती है, उल्टी से कफ शांत होता है तथा उपवास ( लंघन ) से बुखार शांत होता है ।
41. भारी वस्तुयें शरीर का रक्तदाब बढाती है, क्योंकि उनका गुरुत्व अधिक होता है ।
42. दुनिया के महान वैज्ञानिक का स्कूली शिक्षा का सफ़र अच्छा नहीं रहा, चाहे वह 8 वीं फेल न्यूटन हों या 9 वीं फेल आइस्टीन हों , 43. माँस खाने वालों के शरीर से अम्ल-स्राव करने वाली ग्रंथियाँ प्रभावित होती हैं ।
44. तेल हमेशा गाढ़ा खाना चाहिए, सिर्फ लकड़ी वाली घाणी का, दूध हमेशा पतला पीना चाहिए ।
45. छिलके वाली दाल-सब्जियों से कोलेस्ट्रोल हमेशा घटता है ।
46. कोलेस्ट्रोल की बढ़ी हुई स्थिति में इन्सुलिन खून में नहीं जा पाता है ।
ब्लड शुगर का सम्बन्ध ग्लूकोस के साथ नहीं, अपितु कोलेस्ट्रोल के साथ है ।
47. मिर्गी दौरे में अमोनिया या चूने की गंध सूँघानी चाहिए ।
48. सिरदर्द में एक चुटकी नौसादर व अदरक का रस रोगी को सुंघायें ।
49. भोजन के पहले मीठा खाने से तथा बाद में खट्टा खाने से शुगर नहीं होता है ।
50. भोजन के आधे घंटे पहले सलाद खाएं, उसके बाद भोजन करें ।
51. अवसाद में आयरन, कैल्शियम, फास्फोरस की कमी हो जाती है ।
फास्फोरस गुड़ और अमरुद में अधिक है ।
52. पीले केले में आयरन कम और कैल्शियम अधिक होता है ।
हरे केले में कैल्शियम थोड़ा कम, लेकिन फास्फोरस ज्यादा होता है तथा लाल केले में कैल्शियम कम, आयरन ज्यादा होता है ।
हर हरी चीज में भरपूर फास्फोरस होती है, वही हरी चीज पकने के बाद पीली हो जाती है, जिसमें कैल्शियम अधिक होता है ।
53. छोटे केले में बड़े केले से ज्यादा कैल्शियम होता है ।

बीमारी और उपचार

54. रसौली की गलाने वाली सारी दवाएँ चूने से बनती हैं ।
55. हेपेटाइट्स A से E तक के लिए चूना बेहतर है ।
56. एंटी टिटनेस के लिए हाईपेरियम 200 की दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दें ।
57. ऐसी चोट जिसमें खून जम गया हो, उसके लिए नैट्रमसल्फ दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दें ।
बच्चों को एक बूंद पानी में डालकर दें ।
58. मोटे लोगों में कैल्शियम की कमी होती है, अतः त्रिफला दें ।
त्रिकूट (सोंठ+कालीमिर्च+ मघा पीपली) भी दे सकते हैं ।
59. अस्थमा में नारियल दें ।
नारियल फल होते हुए भी क्षारीय है ।
दालचीनी + गुड़ + नारियल दें ।
60. चूना बालों को मजबूत करता है तथा आँखों की रोशनी बढ़ाता है ।
61. दूध का सर्फेसटेंसेज कम होने से त्वचा का कचरा बाहर निकाल देता है ।
62. गाय की घी सबसे अधिक पित्तनाशक, फिर कफ व वायुनाशक है ।
63. जिस भोजन में सूर्य का प्रकाश व हवा का स्पर्श ना हो उसे नहीं खाना चाहिए ।
64. गौ-मूत्र अर्क आँखों में ना डालें ।
65. गाय के दूध में घी मिलाकर देने से कफ की संभावना कम होती है, लेकिन चीनी मिलाकर देने से कफ बढ़ता है ।
66. मासिक के दौरान वायु बढ़ जाता है, 3-4 दिन स्त्रियों को उल्टा सोना चाहिए, इससे गर्भाशय फैलने का खतरा नहीं रहता है दर्द की स्थति में गर्म पानी में देशी घी दो चम्मच डालकर पियें ।

भोजन का तरीका और प्रकार

67. रात में आलू खाने से वजन बढ़ता है ।
68. भोजन के बाद वज्रासन में बैठने से वात नियंत्रित होता है 69. भोजन के बाद कंघी करें, कंघी करते समय आपके बालों में कंघी के दांत चुभने चाहिए ।
बाल जल्द सफ़ेद नहीं होगा ।
70. अजवाईन अपान वायु को बढ़ा देता है, जिससे पेट की समस्यायें कम होती है ।
71. अगर पेट में मल बंध गया है तो अदरक का रस या सोंठ का प्रयोग करें ।
72. कब्ज होने की अवस्था में सुबह पानी पीकर कुछ देर एड़ियों के बल चलना चाहिए ।
73. रास्ता चलने, श्रम कार्य के बाद थकने पर या धातु गर्म होने पर दायीं करवट लेटना चाहिए ।
74. जो दिन में दायीं करवट लेता है तथा रात्रि में बायीं करवट लेता है, उसे थकान व शारीरिक पीड़ा कम होती है ।
75. बिना कैल्शियम की उपस्थिति के कोई भी विटामिन व पोषक तत्व पूर्ण कार्य नहीं करते हैं ।
76. स्वस्थ्य व्यक्ति सिर्फ 5 मिनट शौच में लगाता है ।
77. भोजन करते समय डकार आपके भोजन को पूर्ण और हाजमे को संतुष्टि का संकेत है ।
78. सुबह के नाश्ते में फल, दोपहर को दही व रात्रि को दूध का सेवन करना चाहिए ।
79. रात्रि को कभी भी अधिक प्रोटीन वाली वस्तुयें नहीं खानी चाहिए, जैसे - दाल, पनीर, राजमा, लोबिया आदि ।
80. शौच और भोजन के समय मुंह बंद रखें , भोजन के समय टी वी ना देखें ।
81. मासिक चक्र के दौरान स्त्री को ठंडे पानी से स्नान व आग से दूर रहना चाहिए ।
82. जो बीमारी जितनी देर से आती है, वह उतनी देर से जाती भी है ।
83. जो बीमारी अंदर से आती है , उसका समाधान भी अंदर से ही होना चाहिए ।
84. एलोपैथी ने एक ही चीज दी है, दर्द से राहत ।
आज एलोपैथी की दवाओं के कारण ही लोगों की किडनी , लीवर , आतें , हृदय ख़राब हो रहे हैं ।
एलोपैथी एक बीमारी खत्म करती है तो दस बीमारी देकर भी जाती है ।
85. खाने की वस्तु में कभी भी ऊपर से नमक नहीं डालना चाहिए, ब्लड-प्रेशर बढ़ता है ।
86 . रंगों द्वारा चिकित्सा करने के लिए इंद्रधनुष को समझ लें , पहले जामुनी, फिर नीला ..... अंत में लाल रंग ।
87 . छोटे बच्चों को सबसे अधिक सोना चाहिए , क्योंकि उनमें वह कफ प्रवृति होती है , स्त्री को भी पुरुष से अधिक विश्राम करना चाहिए ।
88. जो सूर्य निकलने के बाद उठते हैं, उन्हें पेट की भयंकर बीमारियां होती हैं, क्योंकि बड़ी आँत मल को चूसने लगती है ।

दैनिक दिनचर्या

89. बिना शरीर की गंदगी निकाले, स्वास्थ्य शरीर की कल्पना निरर्थक है, मल-मूत्र से 5%, कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ने से 22 %, तथा पसीना निकलने लगभग 70 % शरीर से विजातीय तत्व निकलते हैं ।
90. चिंता , क्रोध , ईर्ष्या करने से गलत हार्मोन्स का निर्माण होता है, जिससे कब्ज, बबासीर, अजीर्ण, अपच, रक्तचाप, थायरायड की समस्या उत्पन्न होती है ।
91. गर्मियों में बेल , गुलकंद , तरबूजा , खरबूजा व सर्दियों में सफ़ेद मूसली , सोंठ का प्रयोग करें ।
92. प्रसव के बाद माँ का पीला दूध बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता को 10 गुना बढ़ा देता है ।
बच्चों को टीके लगाने की आवश्यकता नहीं होती है ।
93. रात को सोते समय सर्दियों में देशी मधु लगाकर सोयें, त्वचा में निखार आएगा 94. दुनिया में कोई चीज व्यर्थ नहीं, हमें उपयोग करना आना चाहिए।
95. जो अपने दुखों को दूर करके दूसरों के भी दुःखों को दूर करता है, वही मोक्ष का अधिकारी है ।
96. सोने से आधे घंटे पूर्व जल का सेवन करने से वायु नियंत्रित होती है, लकवा, हार्ट-अटैक का खतरा कम होता है ।
97. स्नान से पूर्व और भोजन के बाद पेशाब जाने से रक्तचाप नियंत्रित होता है।
98 . तेज धूप में चलने के बाद, शारीरिक श्रम करने के बाद, शौच से आने के तुरंत बाद जल का सेवन निषिद्ध है ।
99. त्रिफला अमृत है जिससे वात, पित्त , कफ तीनों शांत होते हैं, इसके अतिरिक्त भोजन के बाद पान व चूना ।
100. इस विश्व की सबसे महंगी दवा लार है, जो प्रकृति ने तुम्हें अनमोल दी है, इसे ना थूकें ।

Friday, April 2, 2021

हिंदी भाषा के प्रयोग में होने वाली अशुद्धियाँ

आज जो में ये लेख लिख रहा हूँ, वास्तव में ये मेरी स्वयं की रचना नहीं है, लेकिन मुझे बहुत अच्छा लगा इसलिए आपके साथ साँझा कर रहा हूँ, लेखक परिचय लेख के अंत में दिया है।

हिन्दी लिखने वाले अक़्सर 'ई' और 'यी' में, 'ए' और 'ये' में और 'एँ' और 'यें' में जाने-अनजाने गड़बड़ करते हैं। कहाँ क्या इस्तेमाल होगा, इसका ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिए...।

'ई' और 'यी' में भेद

जिन शब्दों के अन्त में 'ई' आता है वे संज्ञाएँ होती हैं क्रियाएँ नहीं,
जैसे: मिठाई, मलाई, सिंचाई, ढिठाई, बुनाई, सिलाई, कढ़ाई, निराई, गुणाई, लुगाई, लगाई-बुझाई...।
इसलिए 'तुमने मुझे पिक्चर दिखाई' में 'दिखाई' ग़लत है... इसकी जगह 'दिखायी' का प्रयोग किया जाना चाहिए...।
इसी तरह कई लोग 'नयी' को 'नई' लिखते हैं...।
'नई' ग़लत है, सही शब्द 'नयी' है...
मूल शब्द 'नया' है, उससे 'नयी' बनेगा...।
क्या तुमने क्वेश्चन-पेपर से आंसरशीट मिलायी...?
('मिलाई' ग़लत है...।)
आज उसने मेरी मम्मी से मिलने की इच्छा जतायी...।
('जताई' ग़लत है...।)
उसने बर्थडे-गिफ़्ट के रूप में नयी साड़ी पायी...। ('पाई' ग़लत है...।)

अब आइए 'ए' और 'ये' के प्रयोग पर...।

बच्चों ने प्रतियोगिता के दौरान सुन्दर चित्र बनाये...। ('बनाए' नहीं...।)
लोगों ने नेताओं के सामने अपने-अपने दुखड़े गाये...। ('गाए' नहीं...।)
दीवाली के दिन लखनऊ में लोगों ने अपने-अपने घर सजाये...। ('सजाए' नहीं...।)
तो फिर प्रश्न उठता है कि 'ए' का प्रयोग कहाँ होगा..?
'ए' वहाँ आएगा जहाँ अनुरोध या रिक्वेस्ट की बात होगी...।
अब आप काम देखिए, मैं चलता हूँ...। ('देखिये' नहीं...।)
आप लोग अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी के विषय में सोचिए...। ('सोचिये' नहीं...।)
नवेद! ऐसा विचार मन में न लाइए...। ('लाइये' ग़लत है...।)

अब आख़िर (अन्त) में 'यें' और 'एँ' की बात...

यहाँ भी अनुरोध का नियम ही लागू होगा...
रिक्वेस्ट की जाएगी तो 'एँ' लगेगा, 'यें' नहीं...।
आप लोग कृपया यहाँ आएँ...। ('आयें' नहीं. ।)
जी बताएँ, मैं आपके लिए क्या करूँ? ('बतायें'नहीं।)
मम्मी, आप डैडी को समझाएँ...। ('समझायें' नहीं...।)
अन्त में सही-ग़लत का एक लिटमस टेस्ट...
एकदम आसान सा...

जहाँ आपने 'एँ' या 'ए' लगाया है, वहाँ 'या' लगाकर देखें...।

क्या कोई शब्द बनता है?
यदि नहीं, तो आप ग़लत लिख रहे हैं...।
आजकल लोग 'शुभकामनायें' लिखते हैं... इसे 'शुभकामनाया' कर दीजिए...।
'शुभकामनाया' तो कुछ होता नहीं, इसलिए 'शुभकामनायें' भी नहीं होगा...।
'दुआयें' भी इसलिए ग़लत है और 'सदायें' भी 'देखिये', 'बोलिये', 'सोचिये' इसीलिए ग़लत हैं क्योंकि 'देखिया', 'बोलिया', 'सोचिया' कुछ नहीं होते।

इस लेख की मुख्य रचियता डॉक्टर राजश्री जी है, उनका यह लेख मुझे फेसबुक से प्राप्त हुआ था, जो मूल रूप से यहाँ पर प्रकाशित है - https://www.facebook.com/shrimant.jainendra/posts/4576729845676745

Tuesday, March 23, 2021

भारतीय इतिहास की भयंकर भूल - ताजमहल हिन्दू राजभवन था - ताजमहल का सच

ताजमहल आमेर के राजा मानसिंहजी द्वारा बनवाया हुआ शिवमंदिर है । यमुना नदी के किनारे सफेद पत्थरों से निर्मित अलौकिक सुंदरता की तस्वीर 'ताजमहल' न केवल भारत में, बल्कि पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुका है। ताजमहल को दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल किया गया है। हालांकि इस बात को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं कि ताजमहल को शाहजहां ने बनवाया है या फिर किसी और ने।



भारतीय इतिहास के पन्नों में यह लिखा है कि ताजमहल को शाहजहां ने मुमताज के लिए बनवाया था। वह मुमताज से प्यार करता था। दुनिया भर में ताजमहल को प्रेम का प्रतीक माना जाता है, लेकिन कुछ इतिहासकार इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं। उनका मानना है कि ताजमहल को शाहजहां ने नहीं बनवाया था वह तो पहले से बना हुआ था। उसने इसमें हेर-फेर करके इसे इस्लामिक लुक दिया। दरअसल, इसे शाहजहां और मुमताज का मकबरा माना जाता है। उल्लेखनीय है कि ताजमहल के पूरा होने के तुरंत बाद ही शाहजहां को उसके पुत्र औरंगजेब द्वारा अपदस्थ कर आगरा के किले में कैद कर दिया गया था। शाहजहां की मृत्यु के बाद उसे उसकी पत्नी के बराबर में दफना दिया गया।

दौलत छुपाने की जगह या मुमताज का मकबरा? :
प्रसिद्ध शोधकर्ता और इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपनी शोधपूर्ण पुस्तक में तथ्‍यों के माध्यम से ताजमहल के रहस्य से पर्दा उठाया है। इतिहासकार पुरुषोत्तम ओक ने अपनी पुस्तक में लिखा हैं कि शाहजहां ने दरअसल, वहां अपनी लूट की दौलत छुपा रखी थी इसलिए उसे कब्र के रूप में प्रचारित किया गया। यदि शाहजहां चकाचौंध कर देने वाले ताजमहल का वास्तव में निर्माता होता तो इतिहास में ताजमहल में मुमताज को किस दिन बादशाही ठाठ के साथ दफनाया गया, उसका अवश्य उल्लेख होता।

ओक अनुसार जयपुर राजा से हड़प किए हुए पुराने महल में दफनाए जाने के कारण उस दिन का कोई महत्व नहीं? शहंशाह के लिए मुमताज के कोई मायने नहीं थे। क्योंकि जिस जनानखाने में हजारों सुंदर स्त्रियां हों उसमें भला प्रत्येक स्त्री की मृत्यु का हिसाब कैसे रखा जाए। जिस शाहजहां ने जीवित मुमताज के लिए एक भी निवास नहीं बनवाया वह उसके मरने के बाद भव्य महल बनवाएगा?

यहां दफन है मुमताज!
शोधकर्ताओं के अनुसार आगरा से 600 किलोमीटर दूर बुरहानपुर में मुमताज की कब्र है, जो आज भी ज्यों की त्यों है। बाद में उसके नाम से आगरे के ताजमहल में एक और कब्र बनी जो नकली है। बुरहानपुर से मुमताज का शव आगरे लाने का ढोंग क्यों किया गया? माना जाता है कि मुमताज को दफनाने के बहाने शहजहां ने राजा जयसिंह पर दबाव डालकर उनके महल (ताजमहल) पर कब्जा किया और वहां की संपत्ति हड़पकर उनके द्वारा लूटा गया खजाना छुपाकर सबसे नीचले माला पर रखा था जो बहुत काल तक वहीं रखा रहा। वर्तमान में स्थिति क्या है यह कोई नहीं जानता।

मुमताज का इंतकाल 1631 को बुरहानपुर के बुलारा महल में हुआ था। वहीं उन्हें दफना दिया गया था। लेकिन माना जाता है कि उसके 6 महीने बाद राजकुमार शाह शूजा की निगरानी में उनके शरीर को आगरा लाया गया। आगरा के दक्षिण में उन्हें अस्थाई तौर फिर से दफन किया गया और आखिर में उन्हें अपने मुकाम यानी ताजमहल में दफन कर दिया गया। क्या शाहजहां और मुमताज में प्रेम था?

पुरुषोत्तम अनुसार क्योंकि शाहजहां ने मुमताज के लिए दफन स्थान बनवाया और वह भी इतना सुंदर तो इतिहासकार मानने लगे कि निश्‍चित ही फिर उनका मुमताज के प्रति प्रेम होना ही चाहिए। तब तथाकथित इतिहासकारों और साहित्यकारों ने इसे प्रेम का प्रतीक लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने उनकी गाथा को लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट जैसा लिखा जिसके चलते फिल्में भी बनीं और दुनियाभर में ताजमहल प्रेम का प्रतीक बन गया। यह झूठ आज तक जारी है।



मुमताज से विवाह होने से पूर्व शाहजहां के कई अन्य विवाह हुए थे अत: मुमताज की मृत्यु पर उसकी कब्र के रूप में एक अनोखा खर्चीला ताजमहल बनवाने का कोई कारण नजर नहीं आता। मुमताज किसी सुल्तान या बादशाह की बेटी नहीं थी। उसे किसी विशेष प्रकार के भव्य महल में दफनाने का कोई कारण नजर नहीं अता। उसका कोई खास योगदान भी नहीं था। उसका नाम चर्चा में इसलिए आया क्योंकि युद्ध के रास्ते के दौरान उसने एक बेटी को जन्म दिया था और वह मर गई थी।

शाहजहां के बादशाह बनने के बाद ढाई-तीन वर्ष में ही मुमताज की मृत्यु हो गई थी। इतिहास में मुमताज से शाहजहां के प्रेम का उल्लेख जरा भी नहीं मिलता है। यह तो अंग्रेज शासनकाल के इतिहासकारों की मनगढ़ंत कल्पना है जिसे भारतीय इतिहासकारों ने विस्तार दिया। शाहजहां युद्ध कार्य में ही व्यस्त रहता था। वह अपने सारे विरोधियों की हत्या करने के बाद गद्दी पर बैठा था। ब्रिटिश ज्ञानकोष के अनुसार ताजमहल परिसर में अतिथिगृह, पहरेदारों के लिए कक्ष, अश्वशाला इत्यादि भी हैं। मृतक के लिए इन सबकी क्या आवश्यकता?

ताजमहल के हिन्दू मंदिर होने के सबूत...
इतिहासकार पुरुषोत्त ओक ने अपनी किताब में लिखा है कि ताजमहल के हिन्दू मंदिर होने के कई सबूत मौजूद हैं। सबसे पहले यह कि मुख्य गुम्बद के किरीट पर जो कलश वह हिन्दू मंदिरों की तरह है। यह शिखर कलश आरंभिक 1800 ईस्वी तक स्वर्ण का था और अब यह कांसे का बना है। आज भी हिन्दू मंदिरों पर स्वर्ण कलश स्थापित करने की परंपरा है। यह हिन्दू मंदिरों के शिखर पर भी पाया जाता है। इस कलश पर चंद्रमा बना है। अपने नियोजन के कारण चन्द्रमा एवं कलश की नोक मिलकर एक त्रिशूल का आकार बनाती है, जो कि हिन्दू भगवान शिव का चिह्न है। इसका शिखर एक उलटे रखे कमल से अलंकृत है। यह गुम्बद के किनारों को शिखर पर सम्मिलन देता है।

शाहजहां द्वारा ताजमहल बनाने के कोई सबूत नहीं :
इतिहास में पढ़ाया जाता है कि ताजमहल का निर्माण कार्य 1632 में शुरू और लगभग 1653 में इसका निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। अब सोचिए कि जब मुमताज का इंतकाल 1631 में हुआ तो फिर कैसे उन्हें 1631 में ही ताजमहल में दफना दिया गया, जबकि ताजमहल तो 1632 में बनना शुरू हुआ था। यह सब मनगढ़ंत बाते हैं जो अंग्रेज और मुस्लिम इतिहासकारों ने 18वीं सदी में लिखी। दरअसल 1632 में हिन्दू मंदिर को इस्लामिक लुक देने का कार्य शुरू हुआ। 1649 में इसका मुख्य द्वार बना जिस पर कुरान की आयतें तराशी गईं। इस मुख्य द्वार के ऊपर हिन्‍दू शैली का छोटे गुम्‍बद के आकार का मंडप है और अत्‍यंत भव्‍य प्रतीत होता है। आस पास मीनारें खड़ी की गई और फिर सामने स्थित फव्वारे को फिर से बनाया गया।

ओक ने लिखा है कि जेए मॉण्डेलस्लो ने मुमताज की मृत्यु के 7 वर्ष पश्चात voyoges and travels into the east indies नाम से निजी पर्यटन के संस्मरणों में आगरे का तो उल्लेख किया गया है किंतु ताजमहल के निर्माण का कोई उल्लेख नहीं किया। टॉम्हरनिए के कथन के अनुसार 20 हजार मजदूर यदि 22 वर्ष तक ताजमहल का निर्माण करते रहते तो मॉण्डेलस्लो भी उस विशाल निर्माण कार्य का उल्लेख अवश्य करता।

ताज के नदी के तरफ के दरवाजे के लकड़ी के एक टुकड़े की एक अमेरिकन प्रयोगशाला में की गई कार्बन जांच से पता चला है कि लकड़ी का वो टुकड़ा शाहजहां के काल से 300 वर्ष पहले का है, क्योंकि ताज के दरवाजों को 11वीं सदी से ही मुस्लिम आक्रामकों द्वारा कई बार तोड़कर खोला गया है और फिर से बंद करने के लिए दूसरे दरवाजे भी लगाए गए हैं। ताज और भी पुराना हो सकता है। असल में ताज को सन् 1115 में अर्थात शाहजहां के समय से लगभग 500 वर्ष पूर्व बनवाया गया था।

ताजमहल के गुम्बद पर जो अष्टधातु का कलश खड़ा है वह त्रिशूल आकार का पूर्ण कुंभ है। उसके मध्य दंड के शिखर पर नारियल की आकृति बनी है। नारियल के तले दो झुके हुए आम के पत्ते और उसके नीचे कलश दर्शाया गया है। उस चंद्राकार के दो नोक और उनके बीचोबीच नारियल का शिखर मिलाकर त्रिशूल का आकार बना है। हिन्दू और बौद्ध मंदिरों पर ऐसे ही कलश बने होते हैं। कब्र के ऊपर गुंबद के मध्य से अष्टधातु की एक जंजीर लटक रही है। शिवलिंग पर जल सिंचन करने वाला सुवर्ण कलश इसी जंजीर पर टंगा रहता था। उसे निकालकर जब शाहजहां के खजाने में जमा करा दिया गया तो वह जंजीर लटकी रह गई। उस पर लॉर्ड कर्जन ने एक दीप लटकवा दिया, जो आज भी है।

कब्रगाह या महल?
कब्रगाह को महल क्यों कहा गया? मकबरे को महल क्यों कहा गया? क्या किसी ने इस पर कभी सोचा, क्योंकि पहले से ही निर्मित एक महल को कब्रगाह में बदल दिया गया। कब्रगाह में बदलते वक्त उसका नाम नहीं बदला गया। यहीं पर शाहजहां से गलती हो गई। उस काल के किसी भी सरकारी या शाही दस्तावेज एवं अखबार आदि में 'ताजमहल' शब्द का उल्लेख नहीं आया है। ताजमहल को ताज-ए-महल समझना हास्यास्पद है।

क्या मुमताज के नाम पर रखा मुमताज महल? पुरुषोत्तम लिखते हैं कि 'महल' शब्द मुस्लिम शब्द नहीं है। अरब, ईरान, अफगानिस्तान आदि जगह पर एक भी ऐसी मस्जिद या कब्र नहीं है जिसके बाद महल लगाया गया हो। यह भी गलत है कि मुमताज के कारण इसका नाम मुमताज महल पड़ा, क्योंकि उनकी बेगम का नाम था मुमता-उल-जमानी। यदि मुमताज के नाम पर इसका नाम रखा होता तो ताजमहल के आगे से मुम को हटा देने का कोई औचित्य नजर नहीं आता।

'रहस्य महल' विंसेंट स्मिथ अपनी पुस्तक 'Akbar the Great Moghul' में लिखते हैं, 'बाबर ने सन् 1630 में आगरा के वाटिका वाले महल में अपने उपद्रवी जीवन से मुक्ति पाई। वाटिका वाला वो महल यही ताजमहल था। यह इतना विशाल और भव्य था कि इसके जितन दूसरा कोई भारत में महल नहीं था। बाबर की पुत्री गुलबदन 'हुमायूंनामा' नामक अपने ऐतिहासिक वृत्तांत में ताज का संदर्भ 'रहस्य महल' (Mystic House) के नाम से देती है। ओक के अनुसार प्राप्त सबूतों के आधार पर ताजमहल का निर्माण राजा परमर्दिदेव के शासनकाल में 1155 अश्विन शुक्ल पंचमी, रविवार को हुआ था। अत: बाद में मुहम्मद गौरी सहित कई मुस्लिम आक्रांताओं ने ताजमहल के द्वार आदि को तोड़कर उसको लूटा। यह महल आज के ताजमहल से कई गुना ज्यादा बड़ा था और इसके तीन गुम्बद हुआ करते थे। हिन्दुओं ने उसे फिर से मरम्मत करके बनवाया, लेकिन वे ज्यादा समय तक इस महल की रक्षा नहीं कर सके।

पहले कहते थे इसे तेजो महलय?
पुरषोत्तम नागेश ओक ने ताजमहल पर शोधकार्य करके बताया कि ताजमहल को पहले 'तेजो महलय' कहते थे। वर्तमन ताजमहल पर ऐसे 700 चिन्ह खोजे गए हैं जो इस बात को दर्शाते हैं कि इसका रिकंस्ट्रक्शन किया गया है। इसकी मीनारे बहुत बाद के काल में निर्मित की गई। वास्तुकला के विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में शिवलिंगों में 'तेज-लिंग' का वर्णन आता है। ताजमहल में 'तेज-लिंग' प्रतिष्ठित था इसीलिए उसका नाम 'तेजोमहालय' पड़ा था।

शाहजहां के समय यूरोपीय देशों से आने वाले कई लोगों ने भवन का उल्लेख 'ताज-ए-महल' के नाम से किया है, जो कि उसके शिव मंदिर वाले परंपरागत संस्कृत नाम 'तेजोमहालय' से मेल खाता है। इसके विरुद्ध शाहजहां और औरंगजेब ने बड़ी सावधानी के साथ संस्कृत से मेल खाते इस शब्द का कहीं पर भी प्रयोग न करते हुए उसके स्थान पर पवित्र मकबरा शब्द का ही प्रयोग किया है।

ओक के अनुसार हुमायूं, अकबर, मुमताज, एतमातुद्दौला और सफदरजंग जैसे सारे शाही और दरबारी लोगों को हिन्दू महलों या मंदिरों में दफनाया गया है। इस बात को स्वीकारना ही होगा कि ताजमहल के पहले से बने ताज के भीतर मुमताज की लाश दफनाई गई न कि लाश दफनाने के बाद उसके ऊपर ताज का निर्माण किया गया। 'ताजमहल' शिव मंदिर को इंगित करने वाले शब्द 'तेजोमहालय' शब्द का अपभ्रंश है। तेजोमहालय मंदिर में अग्रेश्वर महादेव प्रतिष्ठित थे। देखने वालों ने अवलोकन किया होगा कि तहखाने के अंदर कब्र वाले कमरे में केवल सफेद संगमरमर के पत्थर लगे हैं जबकि अटारी व कब्रों वाले कमरे में पुष्प लता आदि से चित्रित पच्चीकारी की गई है। इससे साफ जाहिर होता है कि मुमताज के मकबरे वाला कमरा ही शिव मंदिर का गर्भगृह है। संगमरमर की जाली में 108 कलश चित्रित उसके ऊपर 108 कलश आरूढ़ हैं, हिन्दू मंदिर परंपरा में 108 की संख्या को पवित्र माना जाता है।

तेजो महालय का इतिहास :
तेजोमहालय उर्फ ताजमहल को नागनाथेश्वर के नाम से जाना जाता था, क्योंकि उसके जलहरी को नाग के द्वारा लपेटा हुआ जैसा बनाया गया था। यह मंदिर विशालकाय महल क्षेत्र में था। आगरा को प्राचीनकाल में अंगिरा कहते थे, क्योंकि यह ऋषि अंगिरा की तपोभूमि थी। अं‍गिरा ऋषि भगवान शिव के उपासक थे। बहुत प्राचीन काल से ही आगरा में 5 शिव मंदिर बने थे। यहां के निवासी सदियों से इन 5 शिव मंदिरों में जाकर दर्शन व पूजन करते थे। लेकिन अब कुछ सदियों से बालकेश्वर, पृथ्वीनाथ, मनकामेश्वर और राजराजेश्वर नामक केवल 4 ही शिव मंदिर शेष हैं। 5वें शिव मंदिर को सदियों पूर्व कब्र में बदल दिया गया। स्पष्टतः वह 5वां शिव मंदिर आगरा के इष्टदेव नागराज अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर ही हैं, जो कि तेजोमहालय मंदिर उर्फ ताजमहल में प्रतिष्ठित थे।

ताजमहल के तेजो महालय होने के सबूत :
इतिहासकार ओक की पुस्तक अनुसार ताजमहल के हिन्दू निर्माण का साक्ष्य देने वाला काले पत्थर पर उत्कीर्ण एक संस्कृत शिलालेख लखनऊ के वास्तु संग्रहालय के ऊपर तीसरी मंजिल में रखा हुआ है। यह सन् 1155 का है। उसमें राजा परमर्दिदेव के मंत्री सलक्षण द्वारा कहा गया है कि 'स्फटिक जैसा शुभ्र इन्दुमौलीश्‍वर (शंकर) का मंदिर बनाया गया। (वह इ‍तना सुंदर था कि) उसमें निवास करने पर शिवजी को कैलाश लौटने की इच्छा ही नहीं रही। वह मंदिर आश्‍विन शुक्ल पंचमी, रविवार को बनकर तैयार हुआ।

ताजमहल के उद्यान में काले पत्थरों का एक मंडप था, यह एक ऐतिहासिक उल्लेख है। उसी में वह संस्कृत शिलालेख लगा था। उस शिलालेख को कनिंगहम ने जान-बूझकर वटेश्वर शिलालेख कहा है ताकि इतिहासकारों को भ्रम में डाला जा सके और ताजमहल के हिन्दू निर्माण का रहस्य गुप्त रहे। आगरे से 70 मिल दूर बटेश्वर में वह शिलालेख नहीं पाया गया अत: उसे बटेश्वर शिलालेख कहना अंग्रेजी षड्‍यंत्र है।

शाहजहां ने तेजोमहल में जो तोड़फोड़ और हेराफेरी की, उसका एक सूत्र सन् 1874 में प्रकाशित पुरातत्व खाते (आर्किओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के वार्षिक वृत्त के चौथे खंड में पृष्ठ 216 से 17 पर अंकित है। उसमें लिखा है कि हाल में आगरे के वास्तु संग्रहालय के आंगन में जो चौखुंटा काले बसस्ट का प्रस्तर स्तंभ खड़ा है वह स्तंभ तथा उसी की जोड़ी का दूसरा स्तंभ उसके शिखर तथा चबूतरे सहित कभी ताजमहल के उद्यान में प्रस्थापित थे। इससे स्पष्ट है कि लखनऊ के वास्तु संग्रहालय में जो शिलालेख है वह भी काले पत्थर का होने से ताजमहल के उद्यान मंडप में प्रदर्शित था।




हिन्दू मंदिर प्रायः नदी या समुद्र तट पर बनाए जाते हैं। ताज भी यमुना नदी के तट पर बना है, जो कि शिव मंदिर के लिए एक उपयुक्त स्थान है। शिव मंदिर में एक मंजिल के ऊपर एक और मंजिल में दो शिवलिंग स्थापित करने का हिन्दुओं में रिवाज था, जैसा कि उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर और सोमनाथ मंदिर में देखा जा सकता है। ताजमहल में एक कब्र तहखाने में और एक कब्र उसके ऊपर की मंजिल के कक्ष में है तथा दोनों ही कब्रों को मुमताज का बताया जाता है।

जिन संगमरमर के पत्थरों पर कुरान की आयतें लिखी हुई हैं उनके रंग में पीलापन है जबकि शेष पत्थर ऊंची गुणवत्ता वाले शुभ्र रंग के हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि कुरान की आयतों वाले पत्थर बाद में लगाए गए हैं। ताज के दक्षिण में एक प्राचीन पशुशाला है। वहां पर तेजोमहालय की पालतू गायों को बांधा जाता था। मुस्लिम कब्र में गाय कोठा होना एक असंगत बात है। ताजमहल में चारों ओर चार एक समान प्रवेशद्वार हैं, जो कि हिन्दू भवन निर्माण का एक विलक्षण तरीका है जिसे कि चतुर्मुखी भवन कहा जाता है। ताजमहल में ध्वनि को गुंजाने वाला गुम्बद है। हिन्दू मंदिरों के लिए गूंज उत्पन्न करने वाले गुम्बजों का होना अनिवार्य है। बौद्धकाल में इसी तरह के शिव मंदिरों का अधिक निर्माण हुआ था। ताजमहल का गुम्बज कमल की आकृति से अलंकृत है। आज हजारों ऐसे हिन्दू मंदिर हैं, जो कि कमल की आकृति से अलंकृत हैं।

ताजमहल के गुम्बज में सैकड़ों लोहे के छल्ले लगे हुए हैं जिस पर बहुत ही कम लोगों का ध्यान जा पाता है। इन छल्लों पर मिट्टी के आलोकित दीये रखे जाते थे जिससे कि संपूर्ण मंदिर आलोकमय हो जाता था। ताजमहल की चारों मीनारें बाद में बनाई गईं।

ताजमहल का गुप्त स्थान :
इतिहासकार ओक के अनुसार ताज एक सात मंजिला भवन है। शहजादे औरंगजेब के शाहजहां को लिखे पत्र में भी इस बात का विवरण है। भवन की चार मंजिलें संगमरमर पत्थरों से बनी हैं जिनमें चबूतरा, चबूतरे के ऊपर विशाल वृत्तीय मुख्य कक्ष और तहखाने का कक्ष शामिल है। मध्य में दो मंजिलें और हैं जिनमें 12 से 15 विशाल कक्ष हैं। संगमरमर की इन चार मंजिलों के नीचे लाल पत्थरों से बनी दो और मंजिलें हैं, जो कि पिछवाड़े में नदी तट तक चली जाती हैं। सातवीं मंजिल अवश्य ही नदी तट से लगी भूमि के नीचे होनी चाहिए, क्योंकि सभी प्राचीन हिन्दू भवनों में भूमिगत मंजिल हुआ करती है।

नदी तट के भाग में संगमरमर की नींव के ठीक नीचे लाल पत्थरों वाले 22 कमरे हैं जिनके झरोखों को शाहजहां ने चुनवा दिया है। इन कमरों को, जिन्हें कि शाहजहां ने अतिगोपनीय बना दिया है, भारत के पुरातत्व विभाग द्वारा तालों में बंद रखा जाता है। सामान्य दर्शनार्थियों को इनके विषय में अंधेरे में रखा जाता है। इन 22 कमरों की दीवारों तथा भीतरी छतों पर अभी भी प्राचीन हिन्दू चित्रकारी अंकित हैं। इन कमरों से लगा हुआ लगभग 33 फुट लंबा गलियारा है। गलियारे के दोनों सिरों में एक-एक दरवाजे बने हुए हैं। इन दोनों दरवाजों को इस प्रकार से आकर्षक रूप से ईंटों और गारे से चुनवा दिया गया है कि वे दीवार जैसे प्रतीत हों।

स्पष्टत: मूल रूप से शाहजहां द्वारा चुनवाए गए इन दरवाजों को कई बार खुलवाया और फिर से चुनवाया गया है। सन् 1934 में दिल्ली के एक निवासी ने चुनवाए हुए दरवाजे के ऊपर पड़ी एक दरार से झांककर देखा था। उसके भीतर एक वृहत कक्ष (huge hall) और वहां के दृश्य को‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍ देखकर वह हक्का-बक्का रह गया तथा भयभीत-सा हो गया। वहां बीचोबीच भगवान शिव का चित्र था जिसका सिर कटा हुआ था और उसके चारों ओर बहुत सारी मूर्तियों का जमावड़ा था। ऐसा भी हो सकता है कि वहां पर संस्कृत के शिलालेख भी हों। यह सुनिश्चित करने के लिए कि ताजमहल हिन्दू चित्र, संस्कृत शिलालेख, धार्मिक लेख, सिक्के तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं जैसे कौन-कौन-से साक्ष्य छुपे हुए हैं, उसकी सातों मंजिलों को खोलकर साफ-सफाई कराने की नितांत आवश्यकता है।

फ्रांसीसी यात्री बेर्नियर ने लिखा है कि ताज के निचले रहस्यमय कक्षों में गैर मुस्लिमों को जाने की इजाजत नहीं थी, क्योंकि वहां चौंधिया देने वाली वस्तुएं थीं। यदि वे वस्तुएं शाहजहां ने खुद ही रखवाई होती तो वह जनता के सामने उनका प्रदर्शन गौरव के साथ करता, परंतु वे तो लूटी हुई वस्तुएं थीं और शाहजहां उन्हें अपने खजाने में ले जाना चाहता था इसीलिए वह नहीं चाहता था कि कोई उन्हें देखे।

नदी के पिछवाड़े में हिन्दू बस्तियां, बहुत से हिन्दू प्राचीन घाट और प्राचीन हिन्दू शवदाह गृह हैं। यदि शाहजहां ने ताज को बनवाया होता तो इन सबको नष्ट कर दिया गया होता।

तोहफे में नहीं मिला था राजा जयसिंह से छीना था यह महल : कोई किसी को मंदिर तोहफे में नहीं देता। पुरुषोत्तम ओक के अनुसार बादशाहनामा, जो कि शाहजहां के दरबार के लेखा-जोखा की पुस्तक है, में स्वीकारोक्ति है (पृष्ठ 403 भाग 1) कि मुमताज को दफनाने के लिए जयपुर के महाराजा जयसिंह से एक चमकदार, बड़े गुम्बद वाला विशाल भवन (इमारत-ए-आलीशान व गुम्बज) लिया गया, जो कि राजा मानसिंह के भवन के नाम से जाना जाता था।

जयपुर के पूर्व महाराजा ने अपनी दैनंदिनी में 18 दिसंबर, 1633 को जारी किए गए शाहजहां के ताज भवन समूह को मांगने के बाबत दो फरमानों (नए क्रमांक आर. 176 और 177) के विषय में लिख रखा है। यह बात जयपुर के उस समय के शासक के लिए घोर लज्जाजनक थी और इसे कभी भी आम नहीं किया गया।

ताजमहल के बाहर पुरातत्व विभाग में रखे हुए शिलालेख में वर्णित है कि शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल को दफनाने के लिए एक विशाल इमारत बनवाई जिसे बनाने में सन् 1631 से लेकर 1653 तक 22 वर्ष लगे। यह शिलालेख ऐतिहासिक घपले का नमूना है।

ओक लिखते हैं कि शहजादा औरंगजेब द्वारा अपने पिता को लिखी गई चिट्ठी को कम से कम तीन महत्वपूर्ण ऐतिहासिक वृत्तांतों में दर्ज किया गया है जिनके नाम 'आदाब-ए-आलमगिरी', 'यादगारनामा' और 'मुरुक्का-ए-अकबराबादी' (1931 में सैद अहमद, आगरा द्वारा संपादित, पृष्ठ 43, टीका 2) हैं। उस चिट्ठी में सन् 1662 में औरंगजेब ने खुद लिखा है कि मुमताज के सात मंजिला लोकप्रिय दफन स्थान के प्रांगण में स्थित कई इमारतें इतनी पुरानी हो चुकी हैं कि उनमें पानी चू रहा है और गुम्बद के उत्तरी सिरे में दरार पैदा हो गई है। इसी कारण से औरंगजेब ने खुद के खर्च से इमारतों की तुरंत मरम्मत के लिए फरमान जारी किया और बादशाह से सिफारिश की कि बाद में और भी विस्तारपूर्वक मरम्मत कार्य करवाया जाए। यह इस बात का साक्ष्य है कि शाहजहां के समय में ही ताज प्रांगण इतना पुराना हो चुका था कि तुरंत मरम्मत करवाने की जरूरत थी।

शाहजहां के दरबारी लेखक मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ने अपने 'बादशाहनामा' में मुगल शासक बादशाह का संपूर्ण वृत्तांत 1000 से ज्यादा पृष्ठों में लिखा है जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि शाहजहां की बेगम मुमताज-उल-मानी जिसे मृत्यु के बाद बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था और इसके 6 माह बाद तारीख 15 मदी-उल-अउवल दिन शुक्रवार को अकबराबाद आगरा लाया गया फिर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) में पुनः दफनाया गया।

लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों की इस आलीशान मंजिल से बेहद प्यार करते थे, पर बादशाह के दबाव में वे इसे देने के लिए तैयार हो गए थे। इस बात की पुष्टि के लिए यहां यह बताना अत्यंत आवश्यक है कि जयपुर के पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनों आदेश अभी तक रखे हुए हैं, जो शाहजहां द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा जयसिंह को दिए गए थे।

साभार : इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक की पु्स्तक 'ताजमहल तेजोमहालय शिव मंदिर है' से अंश।
https://www.bbc.com/news/world-asia-india-41813339



Saturday, March 13, 2021

मोदी की मुश्किलें बढ़ा रहा है विपक्ष

नरेंद्र मोदी एक बहुत लम्बे समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, पुरे कार्यकाल में अपने बेदाग चरित्र और हिन्दुओ के संरक्षक के रूप में प्रसिद्द रहे या यु कहे की वो सिर्फ हिंदी हितो का ही ध्यान रखते है ऐसे नरेटिव सेट किये गए, जबकि आप निष्पक्ष से देखेंगे तो पाएंगे की उनके सभी कर्म सभी जनो के लिए है, जाती और धर्म के भेदभाव से परे। 



बस उनमे एक ही ज़िद है की भारत देश का गौरव ऊँचा रहे भले ही उसके लिए उनको व्यक्तिगत रूप से कोई भी कीमत चुकानी पड़ जाय, दूसरे उनके मन में राजनैतिक रूप से उपेक्षित हिन्दुओ के लिए कुछ दया भाव है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं है की अन्य धर्मो के लोगो से कोई घृणा या द्वेष है, जबकि एक खास वर्ग को उनसे बड़ी नफरत है। 

वर्तमान का विपक्ष और इसका वोटबैंक 

अब हम थोड़ा वर्तमान के विपक्ष का चरित्र चित्रण करना चाहेंगे, वर्तमान का विपक्ष भूतकाल का सत्ता सीन समाज था जिसने राजतंत्र को अपनी जागीर मान लिया था, और जनता को मुफ्त की चीजे बाँट कर, शिक्षा और स्वास्थ का स्तर नीचे रख कर, जातिवाद और अपराध को बेलगाम छोड़कर भारत की जनता को एक चक्रवियूह के फंसाये रखा था, जिसके कारण उनका वोटबैंक उनके ही आश्रित हो गया था। 

यहाँ हमने जानबूझकर वोटबैंक को राजनेताओ के आश्रित इसलिए कहा क्युकी उनके पास शिक्षा और रोजगार के अवसर बहुत संकुचित थे इसलिए पुरे पांच साल उनको यही लोग मुफ्त का रासन पानी देंगे इस सोच ने वास्तव में उनको बंधुआ वोटबैंक बना दिया था, और ये वोटबैंक १९५० इसी हालत में है, जो निकल गए वो वोट डालने भी नहीं गए, और मुफ्तखोरी से ग्रामीण ही नहीं पढ़े लिखे लोग भी प्रभावित हो जाते है, आप चाहे तो दिल्ली में इसकी सत्यता परख सकते है। 

मोदी जी का वोटबैंक 

एक बहुत लम्बे समय से देखा गया है की जब भी देश में वोटिंग का प्रतिशत बढ़ता है तो भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधि जीत जाते है, अब इस बढे हुए वोट प्रतिशत में कौन कौन से लोग आते है वो बताते है :

१- शिक्षित युवा वर्ग  - शिक्षा में गुणवत्ता और बढ़ी हुए फीस से परेशान 

२- सवर्ण जाति की महिलाये - दैनिक जीवन के सामान पर मेह्गाई से त्रस्त होकर और सुरक्षा 

३- सवर्ण जाति के पुरुष - अपने बच्चो के भविस्य को सुधारे जाने की उम्मीद से 

४- काम काजी वर्ग - टेक्स और मेह्गाई से निजात पाने के लिए 

५- उद्द्मी वर्ग के लोग - व्यापर में उन्नति के लिए, उचित कर का निर्धारण हेतु  

६- शिक्षित किन्तु बेरोजगार वर्ग - जातिगत आरक्षण और सवर्णो के शोषण से त्रस्त होकर 

७ - जाग्रत हिन्दू - जिसे दिख रहा है की एक वर्ग अपनी आबादी बढ़ा रहा है और धीरे धीरे संसाधनों पर हक लेता जा रहा है।  

८- जवान और किसान - जवान देश की रक्षा में सर्वस्व न्योछावर करते है, लेकिन उनको संसाधन कम मिलते है, किसानो का दलालो और बैंको में व्याज के कारण शोषण होता है इसलिए उसे भी न्याय चाहिए, क्युकी उसको दाम कम मिलते है जबकि बाजार में मंहगाई है। 

विपक्ष का गहरा षड्यंत्र 

जब विपक्ष ने २०१४ में मोदी जी की भयंकर जीत देखि तो मंथन किया की क्या कारण था, सभी दलों ने मंथन किया और पाया की जो लोग कभी वोट डालने घर से नहीं निकले वो भी निकल आये है और ये जीत इसी कारण हुयी है जैसे २००४ में वोटिंग प्रतिशत 58.7, २००९ में 58.21, और अब देखिये २०१४ में 66.44 फिर २०१९ में 67.40 तो ये जो १० से १२ % का बढ़ा हुआ वोट यही विपक्ष को खटक गया, तो इसके लिए बहुत से षड्यंत्र किये जैसे :

१- बीजेपी यानि भारतीय जुमला पार्टी - अब किसी सभा में  १५००० रूपये पर अमित शाह ने कह दिया वो एक जुमला था, यानि के बात ये थी की एक सभा में मोदी जी ने काले धन पर बात करते हुए कहा की देश का काला धन इतना बहार है की अगर आ जाए (ईमादारी से) तो देश के हर नागरिक को लगभग १५ लाख रूपये मिल जायेगे, वैसे इस बात के बाद विदेशो से लोगो ने अपना धन निकाल कर अन्य जगह निवेश करना शुरू क्र दिया, क्युकी ये वास्तव में इशारा था की सरकार बनेगी तो काले धन वालो पर नकेल भी कसी जाएगी, और जो लोग विदेश में पैसा रख रहे है वो हम आपकी तरह छोटी पहुंच के लोग तो है नहीं, उनकी पहुंच बहुत ऊपर, और इस बात को लेकर विपक्ष ने व्यापारी वर्ग को डरा दिया और नॉट बंदी ने इसे और हवा देदी । 

२- GST यानि गब्बर सिंह टेक्स - जब कुछ समय जब GST आया तो विपक्ष ने इसे गब्बर सिंह टेक्स करार दिया, इनके लोकल इकाई के लोगो ने व्यापारिओं को भड़काना शुरू किया की सोचिये पहले पास १० रूपये में चीज बेचते थे अब १३ में बेचनी पड़ेगी क्युकी बिल देना है तो ग्राहक भी कम होंगे और व्यापर में घाटा  होगा,ऐसे करके धीरे धीरे व्यापारिओं को भड़काया, लेकिन वास्तव में देखा जाए तो पहले के अनजाने टेक्स जो शायद GST से ज्यादा ही पड़ते होंगे की तुलना में GST कम और स्पस्ट है, इसमें भी समय समय पर बहुत छूट दी गयी, और इसी बात से माध्यम वर्गीय लोगो भी डरा दिया की पहले आप १० रूपये का सामान लेते थे अब १३ का लेना पड़ेगा, तो मेह्गाई से कहा बचे आप । 

३- अंध भक्त और मोदियाविंद - इन सब बकवास को नजरंदाज करते हुए एक वर्ग ईमानदारी से मोदी के साथ देश के उज्जवल भविस्य के लिए खड़ा था और है, तो न्य पैंतरा अपनाया उसके स्वाभिमान को चोट पहुंचाने का, आप किसी से कितना भी प्रेम करते हो लेकिन अगर कोई आपको उसका दास, सेवक, पिछलग्गू, या फिर भक्त या अंधभक्त कहेगा तो आपके स्वाभिमान को एकदम से नहीं लेकिन धीरे धीरे चोट लगना शुरू हो जाएगी और एक घुटन सी होने लगेगी, लेकिन विपक्ष का ये पैंतरा भी फ़ैल हो क्या क्युकी मोदी समर्थको के इसका जबाबा बहुत करारा दिया  और विपक्ष के हथकंडे फिर फ़ैल हुए। 

४- नोटा का सोटा - जब ये सारे हथकंडे फ़ैल होते दिखे तो विपक्ष का एक वर्ग अंदरूनी तौर पर ऐसे लोगो को उकसाने लगा है की मोदी जी सत्ता में आने के बाद हिन्दुओ से ज्यादा गैर हिन्दुओ के हिमायती है, सवर्णो से ज्यादा गैर सवर्णो के है,  मध्यम वर्गीय जनता और छोटे व्यापारिओं से ज्यादा बड़े बड़े उद्दोगपतिओं के हिमायती है, तो इसबार बीजेपी को सबक सिखाने के नोटा दबाएंगे, अब नोटा दबाने वालो का वोट १२ से १४ प्रतिशत होगा लेकिन ये वोटिंग का प्रतिशत फिर से ६० के अंदर ले आएगा जिससे पहले की तरह गैर बीजेपी की सरकार बन सकती है, लेकिन जमीनी स्तर पर हमे रोकना होगा इस नोटा की तरफ रुझान करती हुयी जनता को। 

तो इस प्रकार हम देख सकते है, जब भी भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आती है, कुत्तो के तरह लड़ने वाला विपक्ष एकजुट होकर बीजेपी को हराने में लग जाता है, क्युकी यही वो पार्टी है जो भारत को समृद्ध और भारतीओं को सक्षम बनाने का प्रयास करती है, और एक पढ़ा लिखा जागरूक व्यक्ति कभी मुफ्तखोरी पर वोट नहीं देगा क्युकी उसे पता होगा की जो मुफ्त दिया जा रहा है उसका पैसा उसी से किसी अन्य माध्यम से लिया जायेगा, न केवल लिया जायेगा वल्कि भरस्टाचार भी होगा। 

तो वोट देने से पहले देश को कैसे समृद्ध बना सकते है इस पर विचार करियेगा, और कौन सी पार्टी इस सपने को पूरा कर सकती है।  

वन्दे मातरम ! भारत माता की जय !!


Sunday, December 13, 2020

भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण की कार्यशैली में अंतर

हम बहुत से हिन्दू जीवन शैली जीने वालो को अभी तक अपने धर्म का सही नाम नहीं पता है, कभी हिन्दू धर्म बना दिया जाता है, कभी वैदिक कभी सनातन और कभी वैष्णव, शैव या अन्य, लेकिन वास्तव में हमारा धर्म तो सनातन धर्म ही है जिसमे वेद और पुराण दोनों ही महत्वपूर्ण है, भगवान शिव, विष्णु, इनके अवतार और अन्य देवी देवता भी, वास्तव में  किसी भी देवी, देवता या भगवान के बिना हमारा धर्म अपने विस्तृत स्वभाव से अलग हट जाता है, हमे वेदो में वर्णित सभी देवता चाहिए जो अपने अपने विभागों को देखते है, जैसे जल का देवता, वायु का देवता, अग्नि का देवता, प्रकाश का देवता इत्यादि इत्यादि। 

वेदो में देवो का वर्णन है, जबकि पुराणों में उस पूर्ण परमेश्वर की लीलाओ का  वर्णन है जिसने इन देवताओ को बनाया है, इन्ही दो पूर्ण परमेश्वर के अवतार में हमारे सर्व पूज्य प्रभु है, श्री राम और भगवान श्री कृष्ण, दोनों का एक ही उद्देश्य था साधुओ और भक्तो को उद्धार करना तथा दुष्टो का विनाश करना, लेकिन फिर भी दोनों क्रिया कलापो में अंतर है, और यही अंतर् हम सबको आनंदित करता है, तो हम शुरू करते है वेदों से जिसका अर्थ होता है जानना। 

वेद चार है, लेकिन फिर भी सामवेद भगवद स्तुति के लिए सर्वथा उचित है, सामवेद में दो तरह के श्लोक है। अरण्य के श्लोक और ग्राम के श्लोक। अरण्य जहां नियम नहीं होते, ग्राम जहाँ नियम होते हैं। अरण्य जहाँ पशु रहते हैं, ग्राम जहाँ मानव रहते हैं। राम यज्ञ से पैदा हुए थे, आकाश पुत्र थे। उनकी पत्नी सीता भूमि से पैदा हुई थी, भूमिजा थी, वन्य कन्या थी। राम सारी उम्र अरण्य के पशुओं और ग्राम के मानवों को मैनेज करने में लगे रहे, पशुओं को इंसान बनाते रहे। राम ग्राम वासी भी थे और वनवासी भी। वन में शिव रहते है जो दिगंबर हैं। शिव देह पर भभूत लगाए बैठे है, दिगम्बर हैं। देह पर भभूत लगाने का अर्थ है देह को ही त्याग देना। राम शिव भक्त भी है इसलिए राम के फैसलो में, भाव में दिगम्बर परम्परा दिखती है। माँ के कहने पर राज्य त्याग दिया, आभूषण त्याग दिए, मुकुट त्याग दिया। धोबी के कहने पर रानी सीता त्याग दी। जीवन पर्यन्त नियमों का पालन करते रहे, नियम सही हो या गलत उन्हें पालन करना ही था। 

इसके विपरीत कृष्ण कभी किसी बंधन में नहीं रहे। उनके ऊपर परिवार का सबसे बड़ा बेटा होने का भार नहीं था। वो सबसे छोटे थे इसलिए स्वतंत्र थे और चंचल भी। मर्यादा का भार नहीं था उनपर। उन्होंने अरण्य और ग्राम में बैलेंस साधने की कोशिश कभी नहीं की। उन्होंने वन को ही मधुवन बना लिया। वो राजा नहीं थे,न ही राजा बन सकते थे इसलिए गलत नियम मानने को बाध्य नहीं थे कृष्ण। उन्होंने नियमों को नहीं माना। राम rवचन के पक्के थे, उन्होने अयोध्या वासियों को वचन दिया था कि चौदह वर्ष बाद लौट आऊँगा। समय से पहुँचने के लिए उन्होंने पुष्पक विमान का उपयोग किया। कृष्ण ने गोपियों को वचन दिया था, मथुरा से लौट कर जरुर आऊँगा, वो कभी नहीं लौटे। राम ने गलत सही हर नियम माना, कृष्ण ने गलत नियम तोड़े। राम के राज्य में एक मामूली व्यक्ति रानी पर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नियम के तहत गॉसिप कर सकता था मगर कृष्ण को शिशुपाल भी सौ से ज्यादा गाली नहीं दे सकते थे। राम मदद तभी करते है जब आप खुद लड़ो। वो पीछे से मदद करेंगे। सुग्रीव को दो बार बाली से पिटना पड़ा तब राम ने वाण चलाया। कृष्ण स्वयं सारथी बन के आगे बैठते हैं और समय आने पर चक्र लेकर दौड़ पड़ते है ।

मूल भावना इस लेख की ये है, की भगवान स्वयं पृथ्वी पर आकर मनुस्यो को जीवन जीने का मार्ग बताते है, उनके साथ जीवन का आनंद लेते है, और अपने और जीवधारी के बीच की दुरी को कम करते है या खत्म करते है।