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 जब देश स्वतंत्रत हुआ तो बहुत से बुद्धि जीविओ ने विचार किया की एक बहुत बड़ी आबादी पुरे स्वतंत्रता संग्राम में निष्क्रिय रही! लेकिन क्यों रही ? इस सोच विचार में उन्होंने पाया की शायद अशिक्षा और उपेक्षा इसका एक कारन रहा है, उनको हम लोग साथ लेकर नहीं चले, ये एक नैतिकता के आधार पर आत्मग्लानि हुयी जो शायद उस समय उत्कृस्ट सोच का उद्दाहरण था और उन्होंने आरक्षण जैसा प्रावधान लाकर उनको मुख्य धारा में जोड़ने का प्रयास किया की अब देश के विकास में हम और ये दोनों लोग मिलकर काम करेंगे और देश का विकास करेंगे, और इसके लिए हमारे सवर्ण पूर्वजो ने इतिहास को खंगाल कर कुछ इस बहुसंख्यक आबादी के कुछ महापुरष निकाले जिन्होंने शिक्षा और समाज के लिए कुछ छोटा मोटा योगदान तो दिया लेकिन वास्तव में वो खुद को श्रेष्ठ बनाने का उनका शॉर्टकट उपाय था फिर भी उनकी अच्छी बातो की कहानिया बना कर इस विशाल जनसमुदाय को समझने और समझाने के प्रयास किया की मेहनत करो, सकारत्मक सोचो और आगे बढ़ो।  लेकिन जैसे ही इस समुदाय को अपनी जाति के महापुरुष मिले, उनके लिखे कुछ वांगमय, उनके कुत्षित विचारो का पुलिंदा मिला इन लोगो ने बजाये देश ...

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