भारतीय कम्युनिस्टों का राष्ट्रबोध: विचारधारा, सत्ता और भारत के प्रति दृष्टिकोण का एक गंभीर विश्लेषण
किसी भी राजनीतिक विचारधारा की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वह कितने आकर्षक सिद्धांत प्रस्तुत करती है, बल्कि इस बात से होती है कि उसके अनुयायी अपने देश, समाज, लोकतंत्र और राष्ट्रीय हितों के प्रति कैसा व्यवहार करते हैं। भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा पर बहस करते समय एक प्रश्न बार-बार सामने आता है: जिस साम्यवादी विचारधारा की बौद्धिक जड़ें यूरोप में विकसित हुईं और जिसने चीन जैसे देश में सत्ता प्राप्त की, उससे प्रभावित भारत के कुछ राजनीतिक समूहों के भीतर राष्ट्र, राष्ट्रीय सुरक्षा, भारतीय सभ्यता और निर्वाचित सरकार के प्रति इतना गहरा अविश्वास क्यों दिखाई देता है? यह प्रश्न केवल कम्युनिस्टों की आलोचना का नहीं, बल्कि विचारधारा और राष्ट्रबोध के बीच संबंध को समझने का है। 1. जिन देशों में कम्युनिस्ट विचारधारा विकसित हुई, वहाँ राष्ट्र का प्रश्न कैसे बदला? कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने उन्नीसवीं सदी के यूरोप में पूँजीवादी व्यवस्था, श्रमिक शोषण और वर्ग-संघर्ष का विश्लेषण किया। मार्क्स ने मजदूरों की एकजुटता को राष्ट्रीय सीमाओं से आगे देखने की बात की। इसी कारण पारंपरिक मार्क्सवादी चिंतन म...

