Official Blog of Ambrish Shrivastava

Saturday, October 3, 2020

या तो समय के साथ बदलिए, या फिर मार्किट से हटिये

बाजार रोज बदल रहा है, पहले भी कामदार की जगह बिचोलिये ज्यादा कमाते थे और आज भी  भी, मूल ये है आप कितना बेहतर सोच सकते है और उसे कर या करवा सकते है, ग्रामोफोन से कैसेट, केसेट से सीदीं, फिर pendrive, मेमोरी कार्ड और सब सब फ्री लेकिन फिर भी पैसे कमाए जा रहे है।  

1998 में Kodak में 1,70,000 कर्मचारी काम करते थे और वो दुनिया का 85% फ़ोटो पेपर बेचते थे..चंद सालों में ही Digital photography ने उनको बाज़ार से बाहर कर दिया.. Kodak दिवालिया हो गयी और उनके सब कर्मचारी सड़क पे आ गए।

  • HMT (घडी)
  • BAJAJ (स्कूटर)
  • DYNORA (टीवी)
  • MURPHY (रेडियो)
  • NOKIA (मोबाइल)
  • RAJDOOT (बाईक)
  • AMBASDOR (कार)


मित्रों, इन सभी की गुणवक्ता में कोई कमी नहीं थी फिर भी बाजार से बाहर हो गए!! कारण???



उन्होंने समय के साथ बदलाव नहीं किया.!!

आपको अंदाजा है कि आने वाले 10 सालों में दुनिया पूरी तरह बदल जायेगी और आज चलने वाले 70 से 90% उद्योग बंद हो जायेंगे।

चौथी औद्योगिक क्रान्ति में आपका स्वागत है...

Uber सिर्फ एक software है। उनकी अपनी खुद की एक भी Car नहीं इसके बावजूद वो दुनिया की सबसे बड़ी Taxi Company है।

Airbnb दुनिया की सबसे बड़ी Hotel Company है, जब कि उनके पास अपना खुद का एक भी होटल नहीं है।

Paytm, ola cabs , oyo rooms जैसे अनेक उदाहरण हैं।

US में अब युवा वकीलों के लिए कोई काम नहीं बचा है, क्यों कि IBM Watson नामक Software पल भर में ज़्यादा बेहतर Legal Advice दे देता है। अगले 10 साल में US के 90% वकील बेरोजगार हो जायेंगे... जो 10% बचेंगे... वो Super Specialists होंगे।

Watson नामक Software मनुष्य की तुलना में Cancer का Diagnosis 4 गुना ज़्यादा Accuracy से करता है। 2030 तक Computer मनुष्य से ज़्यादा Intelligent हो जाएगा।

अगले 10 सालों में दुनिया भर की सड़कों से 90% cars गायब हो जायेंगी... जो बचेंगी वो या तो Electric Cars होंगी या फिर Hybrid...सडकें खाली होंगी,Petrol की खपत 90% घट जायेगी,सारे अरब देश दिवालिया हो जायेंगे।

आप Uber जैसे एक Software से Car मंगाएंगे और कुछ ही क्षणों में एक Driverless कार आपके दरवाज़े पे खड़ी होगी...उसे यदि आप किसी के साथ शेयर कर लेंगे तो वो ride आपकी Bike से भी सस्ती पड़ेगी।

Cars के Driverless होने के कारण 99% Accidents होने बंद हो जायेंगे.. इस से Car Insurance नामक धन्धा बंद हो जाएगा।

ड्राईवर जैसा कोई रोज़गार धरती पे नहीं बचेगा। जब शहरों और सड़कों से 90% Cars गायब हो जायेंगी, तो Traffic और Parking जैसी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जायेंगी... क्योंकि एक कार आज की 20 Cars के बराबर होगी।

आज से 5 या 10 साल पहले ऐसी कोई ऐसी जगह नहीं होती थी जहां PCO न हो। फिर जब सब की जेब में मोबाइल फोन आ गया, तो PCO बंद होने लगे.. फिर उन सब PCO वालों ने फोन का recharge बेचना शुरू कर दिया। अब तो रिचार्ज भी ऑन लाइन होने लगा है।

आपने कभी ध्यान दिया है..?

आजकल बाज़ार में हर तीसरी दुकान आजकल मोबाइल फोन की है।

sale, service, recharge , accessories, repair, maintenance की।

अब सब Paytm से हो जाता है.. अब तो लोग रेल का टिकट भी अपने फोन से ही बुक कराने लगे हैं.. अब पैसे का लेनदेन भी बदल रहा है.. Currency Note की जगह पहले Plastic Money ने ली और अब Digital हो गया है लेनदेन।

दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है.. आँख कान नाक खुले रखिये वरना आप पीछे छूट जायेंगे..।

समय के साथ बदलने की तैयारी करें।

इसलिए...व्यक्ति को समयानुसार अपने व्यापार एवं अपने स्वभाव में भी बदलाव करते रहना चाहिये।

 "Time to Time Update & Upgrade"

समय के साथ चलिये और सफलता पाईये । 

Sunday, September 13, 2020

6 साल में कैसे खतरे में आया लोकतंत्र और संविधान

 संवैधानिक संस्थाएं औऱ लोकतंत्र 2014 से पहले कभी खतरे में क्यों नही थे ?  अचानक ऐसा क्या हुआ है कि देश भर में एक वर्ग ऐसा वातावरण बनाने में जुटा है मानों भारत में कोई तानाशाही राज आ गया है। दुहाई लोकतंत्र की जा रही है लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया या संवैधानिक प्रावधानों पर खुद ही इस तबके को भरोसा नही है।असल में यह भारत के नए समावेशी लोकतंत्र को अस्वीकार करने का सामंती प्रलाप भर है।

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देश की संसदीय राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं को अपनी एकपक्षीय विचारसरणी से संचालित करने वाला कतिपय उदारवादी बौद्धिक जगत नए भारत की व्यवस्थाओं  से बेदखल होता जा रहा है। यह बेदखली भी पूर्णतः लोकतांत्रिक प्रक्रिया के धरातल पर हो रही है।भारत के आत्मगौरव को कुचलकर अल्पसंख्यकवाद और तुष्टीकरण पर खड़ी की गई भारतीय शासन औऱ राजनीति की व्यवस्थाओ के कमजोर होने से जिहादी बौद्धिक गिरोह अब उन्ही संस्थाओं को निशाने पर ले रहा है जो कभी इनके एजेंडे को आगे बढ़ाने में सहायक थी।

 वकील प्रशांत भूषण के ताजा अवमानना प्रकरण को बड़े व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।यह प्रकरण महज एक अवमानना भर का नही है बल्कि वामपंथ एवं कांग्रेस विचारधारा का बिषैला औऱ भारत विरोधी चेहरा भी उजागर करता है ।सुप्रीम कोर्ट से सजा सुनाएं जाने के बाद "स्वराज अभियान" के योगेंद्र यादव ने "कैम्पेन फ़ॉर ज्यूडिशियल अकाउंटबिलिटी एंड रिफॉर्म" शुरू करने का एलान किया। 

इस अभियान में अभिव्यक्ति की आजादी को बचाने के लिए देश भर से एक एक रुपया एकत्रित करने का भी आह्वान है।योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की राजनीतिक प्रतिबद्धता किसी से छिपी नही है। सवाल यह उठाया जा सकता है कि देश में करोड़ों मुकदमें बर्षों से लंबित है  लेकिन  अकाउंटबिलिटी का सवाल इस अर्थ में पहले नही उठाया गया। भूषण एन्ड कम्पनी  खुद देश की सर्वोच्च अदालत को अपने दबाब में लेती रही है।किसी भी मामले में जब इन्हें मनमाकिफ़ निर्णय की उम्मीद नही होती तो सुनियोजित तरीके से बाहर आकर कोर्ट और जज के विरुद्ध चिल्लाने लगते है और जब फैक्ट के आधार पर निर्णय आ जाते है तब यही भूषण खुद को गांधी बनाने में जुट जाते है।

समस्या इस बार जस्टिस अरुण मिश्रा को लेकर इसलिए खड़ी की गई क्योंकि वे भूषण के दबाब में नही आये। जस्टिस मिश्र की कोर्ट में भूषण के अधिकतर मामले लिस्टेड होने पर देश का सुप्रीम कोर्ट आखिर खराब हो जाता है  लेकिन  तथ्य यह है कि प्रशांत भूषण  जब गुजरात दंगों या अमित शाह से जुड़े मामले जस्टिस आफताब आलम के यहां लिस्टेड कराते रहे तब सुप्रीम कोर्ट निष्पक्ष औऱ स्वतंत्र होता था?  

प्रशांत भूषण जिन संस्थाओं से सीधे और परोक्ष रूप से जुड़े है उनकी मानसिकता बीजेपी और आरएसएस ही नही भारत की संप्रभुता के भी विरुद्ध है।जाहिर है अभिव्यक्ति की आजादी या न्यायिक जबाबदेही के उठाये गए सवाल देश हित से जुड़े न होकर एक घोषित एजेंडे का क्रियान्वयन भर है।इसलिए सवाल यह है कि क्या वाकई देश में संवैधानिक संस्थाएं औऱ लोकतंत्र संकट में है ? क्या प्रशांत भूषण,राजीव धवन या राहुल गांधी और उनके साथ समवेत एकेडेमिक्स  ही सुप्रीम कोर्ट के रखवाले है?* 

इन सवालों को हमें इतिहास और वर्तमान के बदले हुए वातावरण में भी देखना चाहिये।तथ्य यह है कि 2014 के बाद यानी केंद्र में नरेन्द्र मोदी को जनता द्वारा सत्ता सौंपने के साथ ही बौद्धिक राजनीतिक जगत में इस जनादेश को ही खारिज करने के सतत प्रयास चल रहे है। देश में जनता पार्टी,सयुंक्त मोर्चा,औऱ यूपीए की सरकारें भी रही लेकिन सवाल केवल मोदी सरकार के वोट परसेंट पर उठाया जाता है। तब भी जब 2019 में जनता ने 2014 से बड़ा बहुमत मोदी को सौंपा है।असल में संसदीय राजनीति की पारदर्शी प्रक्रिया के जरिये भारत विरोधी तत्व जनता की अदालत से अलग थलग हो रहे है।

जाति,सम्प्रदाय और क्षेत्रीयता के साथ अल्पसंख्यकवाद की चुनावी राजनीति लगातार हासिए पर आ पहुँची है, भारत के जिहादी बौद्धिक जगत (एकेडेमिक्स)को इस जमीनी स्थिति ने परेशान कर दिया है।  यह वर्ग लंबे समय से भारतीय शासन और राजनीति का नियामक बना रहा है। प्रशांत भूषण  घटनाक्रम इसी  नियामकीय अस्तित्व के संकट की हताशा है।सुप्रीम कोर्ट भारत के लोकतंत्र का प्रधान पहरेदार है और इसे जनता की दृष्टि में विवादित करके मोदी सरकार के नीतिगत निर्णयों पर अराजकता पैदा करना ही भूषण एन्ड कम्पनी का असली मन्तव्य है ।वातावरण बनाया गया है कि मोदी सरकार ने कोर्ट,चुनाव आयोग,संसद,कार्यपालिका,विश्विद्यालय,मीडिया को  दबाब में ले लिया है।दावा किया जाता है कि लोग सरकार के भय से बोल नहीं पा रहे है।

सुप्रीम कोर्ट ने लॉक डाउन के दौरान मोदी सरकार के विरुद्ध याचिकाएं लेकर आये प्रशांत भूषण को चेतावनी जारी कर  कहा था कि आप पीआईएल लेकर आये है या पब्लिसिटी याचिका। कोर्ट ने यहां तक कहा कि यह नहीं चल सकता है कि  हम आपके मन मुताबिक निर्णय दें तो ठीक, नही दें तो कोर्ट पक्षपाती  है। सच्चाई यह है कि राममंदिर,राफेल ,सुशांत सिंह तीन तलाक,पीएम केयर फ़ंड,सीएए,अनुच्छेद 370, पर सुप्रीम अदालत के निर्णय मोदी विरोधियों के मन मुताबिक नही हुए। सामाजिक कार्यकर्ता के वेष में सक्रिय लोगों का बड़ा तबका इस स्थिति से परेशान है। एक धारणा गढ़ी जा रही है कि "जज" डरे हुए है, भयादोहित है। 

लोकतंत्र खतरे में है और यह देश मे पहली बार हो रहा है।

हकीकत यह है कि 2014 के बाद से देश मे अभिव्यक्ति की आजादी और संवैधानिक संस्थाओं की अक्षुण्णता प्रखरता से बढ़ी है। अतीत में भारत की न्यायिक आजादी को खंगालने की कोशिशें करें तो पता चलता है कांग्रेस औऱ प्रशांत भूषण जैसे गिरोहों ने कोर्ट्स को सदैव सत्ता की पटरानी बनाने के प्रयास किया है।जिन जजों ने अतीत में कांग्रेस सरकारों की बादशाहत को चुनौती दी उन्हें अपमानित कर ठिकाने लगा दिया गया। जबकि सुप्रीम कोर्ट में पदस्थ रहते हुए प्रेस कांफ्रेंस करने वाले जस्टिस रंजन गोगोई मोदी दौर में ही चीफ जस्टिस बने। इंदिरा गांधी ने तो खुलेआम बहुमत के बल पर प्रतिबद्ध न्यायपालिका और ब्यूरोक्रेसी को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता घोषित किया था।

केशवानंद भारती मामला  भारत में  लोकतंत्र की हत्या कर  इंदिरागांधी द्वारा न्यायाधीश को भयादोहित, नियंत्रित और कब्जाने की  नजीर है ।इसकी चर्चा एकेडेमिक्स कभी नही करना चाहते है।

24 अप्रेल 1973 की तारीख को इस केस में निर्णय हुआ।68 दिन जिरह हुई। इंदिरा सरकार ने एड़ी चोटी का जोर लगाया लेकिन वह सुप्रीम कोर्ट में शिकस्त खा गई।भारत के न्यायिक इतिहास में पहली बार 13 जजों की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। 7-6 के बहुमत से निर्णय हुआ कि संसद को संविधान संशोधन का अधिकार तो है लेकिन "आधारभूत सरंचना"बेसिक स्ट्रक्चर से छेड़छाड़ नही की जा सकती है।संवैधानिक सर्वोच्चता,विधि का शासन,कोर्ट की अक्षुण्य आजादी,संसदीय शासन,निष्पक्ष संसदीय चुनाव,गणतन्त्रीय ढांचा,सम्प्रभुता आधारभूत ढांचे में परिभाषित किये गए।इनमें किसी भी प्रकार के संशोधन निषिद्ध कर दिये गए।

13जजों की पीठ में 7 जज फैसले के पक्ष में थे इनमें मुख्य न्यायाधीश एस एम सीकरी,के एस हेगड़े,एके मुखरेजा,जे एम शेलाट, एन एन ग्रोवर, पी जगनमोहन रेड्डी,और एच आर खन्ना।6 जज सरकार के साथ थे जस्टिस ए एन राय,डीजी पालेकर,के के मैथ्यू, एच एम बेग,एस एन द्विवेदी और वाय चन्द्रचूड़।

इस निर्णय से नाराज इंदिरा गांधी के दफ्तर से 25 अप्रेल 1973 को जस्टिस एन एन राय के घर फोन की घण्टी बजती है।क्या उन्हें नए सीजेआई का पद स्वीकार है? जबाब देने के लिए मोहलत मिली सिर्फ दो घण्टे की।

26 अप्रेल 1973 को जस्टिस ए एन राय को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता है तीन सीनियर जज जस्टिस शेलट, ग्रोवर और हेगड़े को दरकिनार कर दिया गया।ये तीनों जज उन 7 जजों में थे जिन्होंने सरकार को असिमित संविधान संशोधन देने से असहमति व्यक्त की थी।क्या ऐसी परिस्थितियां आज मोदी सरकार ने निर्मित की है?

1975 में इंदिरा गांधी ने 39 वा औऱ 41वा  संवैधानिक संशोधन कर कानून बनाया था कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,स्पीकर के चुनाव को कोर्ट में किसी भी आधार पर न चैलेंज  किया जा सकता न कभी  उन पर कोई मुकदमा दर्ज होगा।क्या यह संविधान को खूंटे पर टांगने जैसा नही था।

हालाकि केशवानंद केस के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों संशोधन को खारिज कर दिया था। 1975 में एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला केस आपातकाल में मौलिक अधिकारों की बहाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा था।पांच जजों की पीठ ने 4-1के बहुमत से सरकार के पक्ष में निर्णय दिया।अकेले जस्टिस एच आर खन्ना ने सरकार से असहमत होते हुए निर्णय लिखा।

जस्टिस खन्ना सबसे सीनियर थे लेकिन इस निर्णय के चलते इंदिरा गांधी के निशाने पर आ गए ।उन्हें सुपरसीड करते हुए एम एच बेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया।

एच एम बेग केशवानंद केस में भी सरकार के साथ खड़े थे।इसलिए उन्हें भी जस्टिस राय की तरह स्वामी भक्ति का इनाम मिला।वहीं जस्टिस खन्ना उस केस में भी सरकार के विरूद्ध थे।इसलिए उन्हें सजा दी गई। क्या इन हरकतों से तब संविधान की सर्वोच्चता खण्डित नही हुई थी?

 बेग 1978 तक सीजेआई रहे फिर 1981 से 1988 तक अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष और वहां से हटने के बाद कांग्रेस के मुखपत्र दैनिक हेराल्ड के संचालक बने।

बहरूल इस्लाम के किस्से तो सबको पता ही है कि उन्हें जब चाहा सांसद जब चाहा हाईकोर्ट जज जब चाहा सुप्रीम कोर्ट जज बना दिया गया।

2010 से 2014 के मध्य जस्टिस अरुण मिश्रा वरिष्ठतम हाईकोर्ट जज होने के बाबजूद सुप्रीम कोर्ट में नामित नही किये गए तब किसी ने इस मुद्दे को नही उठाया लेकिन उत्तराखंड हाईकोर्ट में पदस्थ जूनियर जज के एम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट में एलिवेट करने पर मोदी सरकार ने आपत्ति ली तब पूरे  एकेडेमिक्स भूषण जैसे लोगों  के साथ न्यायपालिका की आजादी का रुदाली रुदन बजाने लगे ।ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि जोसेफ अल्पसंख्यकवाद के प्रतीक थे।ऐसे ही तमाम पापों से वाकिफ होने के लिए हमें

जस्टिस जगनमोहन रेड्डी की किताब "वी हैव रिपब्लिक" का अध्ययन करना चाहिये जिसमें

बताया गया है कि  इंदिरा के कानून मंत्री रहे एच आर गोखले और इस्पात मंत्री कुमार मंगलम कैसे जजों को उस दौर में धमकाते थे.

कैसे अभिषेक मनु सिंघवी के शयन कक्ष से हाईकोर्ट जज निकलते है यह जप्त स्टिंग में आज भी रहस्य ही है। पूर्व सीजेआई रंगनाथ  मिश्रा बकायदा कांग्रेस के टिकट से राज्यसभा में विराजे।जबकि रंजन गोगोई तो नामित कोटे से सदस्य बने हैं। श्री मिश्रा के भतीजे तमाम आरोपों के बाद सीजेआई तक बनने में सफल रहे।

जस्टिस आफताब आलम और गुजरात दंगों की झूठी कहानियां गढ़ने वाली तीस्ता सीतलवाड़ की युगलबंदी न्यायिक इतिहास का शर्मनाक स्कैण्डल है। 

हिमाचल के पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह की बेटी जस्टिस अभिलाषा सिंह ने गुजरात हाईकोर्ट और आफताब आलम द्वारा सुप्रीम कोर्ट में गुजरात दंगों पर दिए निर्णय प्रतिबद्ध न्यायपालिका का बदनुमा उदाहरण है।

आतंकी अफजल की फांसी टालने के लिए  भूषण एन्ड कम्पनी के आग्रह पर आधी रात को खुलता सुप्रीम कोर्ट सेक्युलर था,गुजरात दंगों,शोहरबुद्दीन,इशरत जहां,के मामलों में भी कोर्ट अच्छे थे क्योंकि निर्णय मोदी,अमित शाह के विरुद्ध और लिबरल गैंग के एजेंडे के अनुरूप थे।लेकिन मनमाकिफ़  निर्णय न होने पर  कोर्ट पक्षपाती औऱ डरे हुए हो गए   यह आम भारतीय भी अब समझ गया है। बहुमत के बल पर तानाशाही का एक भी उदाहरण मोदी सरकार के साथ नही जुड़ा है

जबकि इंदिरा औऱ राजीव गांधी के कार्यकाल सामाजिक न्याय से जुड़े बीसियों न्यायिक निर्णयों को पलटने के रहे है कमोबेश यही वातावरण चुनाव आयोग और ईवीएम को लेकर बनाया जाता रहा है ।हाल ही में दिग्विजयसिंह ने फिर कहा है कि 2024 में देश मे आखिरी चुनाव होंगे और यह भी ईवीएम के जरिये जीते जायेंगे इसके बाद भारत में कभी चुनाव नही होंगे।इस तरह की दलीलें केवल संसदीय आरोप प्रत्यारोप तक सीमित नही है बल्कि यह लोकतंत्र पर भी सीधा आघात है।

मीडिया का वह दौर याद किया जाना चाहिये जब गुजरात दंगों के बाद मोदी को भारतीय मीडिया ने एक खलनायक की तरह विश्व भर में  स्थापित कर दिया था।आज भी भारत में मोदी और उनकी नीतियों के आलोचक स्वतन्त्रता के साथ अपनी बात कहते है। टेलीग्राफ,हिन्दू जैसे अखबार रोजाना मोदी की खिलाफत में खड़े रहते है 

वर्चुअल स्पेस पर वायर,प्रिंट,जनचौक,सत्याग्रह,क्विंट,क्लिक,कारंवा,तहलका,स्क्रॉल,जनज्वार,न्यूज लाउंड्री जैसे तमाम पोर्टल बेधड़क अपना मोदी विरोधी एजेंडा चला रहे है।

आपातकाल का दंश देने वालों को इसके बाबजूद अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में नजर आती है तो इसके निहितार्थ हमें समझने होंगे। शाहीन बाग से लेकर जेएनयू,एमएमयू,जामिया में देश को तोड़ने तक की तकरीरें खुलेआम दी जाती है फिर भी भारत मे एक वर्ग को डर लगता है।इस गिरोह में दस वर्ष उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी जैसे लोग भी शामिल है ।

सच तो यह है कि संवैधानिक संस्थाओं  औऱ लोकतंत्र को जेबी बनाने के उपक्रम मोदी दौर से पहले बड़ी ही ठसक के साथ होतें रहे है। 1975 का आपातकाल हो या 356 के जरिये संघीय ढांचे को खत्म करना।कांग्रेस और वामपंथ ने देश की जनभावनाओं का कभी ख्याल नही रखा।आज अभिव्यक्ति की चरम आजादी के माहौल में लिबरल्स ने अपने सुगठित एवं विस्तृत सूचना एवं प्रचार तन्त्र से ऐसा माहौल बनाने की कोशिशें की है जो मिथ्या,मनगढ़ंत औऱ फर्जी है।

सुखद पक्ष यह भी है कि देश की अधिसंख्य जनता आज भूषण सरीखे उदारवादियों के वास्तविक एजेंडे को समझ चुकी है।

Source: (डॉ अजय खेमरिया) पाञ्चजन्य के ताजा अंक से Sept 2020

Tuesday, August 25, 2020

खिलाफत आंदोलन असली सच

प्रथम विश्व युद्ध में उस्मानिया सल्तनत को हार का मुंह देखना पड़ा था। तुर्की को छोड़कर उस्मानिया साम्राज्य का हिस्सा रहे सभी क्षेत्रों को मित्र देशों ने आपस में बांट लिया। इससे पहले तुर्की का कुछ तय हो पाता तुर्की के सैन्य कमांडर मुस्तफा कमाल पाशा ने जनता और सेना के साथ मिलकर बगावत कर दी। उन्होंने आज के तुर्की का एकीकरण करके उसे नेशन स्टेट बनाया। वो आधुनिक तुर्की के राष्ट्रपिता भी बने। उन्होंने सदियों के बाद कट्टरवादी उस्मानिया खलिफा राज से निकले तुर्की में अनेक सुधारवादी आंदोलन चलाए। आजतक मुसलमान उनसे नफरत करते हैं क्योंकि उन्हें भारत तो सेक्युलर चाहिये लेकिन तुर्की नहीं।

ये 1920 था जब तुर्की से खलीफा का राज खत्म होने और तुर्की के सेक्युलर लोकतंत्र बनने के विरोध में भारत के मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन शुरू किया। गांधी जी इस समय असहयोग आंदोलन शुरू कर रहे थे तो मुसलमानों को साथ लाने के लिये उन्होंने खिलाफत आंदोलन का समर्थन कर दिया। चौरा चौरी कांड में 22 पुलिसवालों की हत्या के बाद असहयोग आंदोलन तो खत्म हो गया लेकिन खिलाफत की बड़ी भारी कीमत हिन्दुओं ने चुकाई। तुर्की और अंग्रेजों पर तो भारतीय मुसलमानों का ज़ोर चला नहीं तो उन्होंने केरल के मालाबार में भीषण रक्तपात किया। सरकारी आकंड़ों को हिसाब से इन दंगों में 10 हज़ार हिन्दुओं की हत्या की गई। हज़ारो महिलाओं के साथ रेप हुआ और हज़ारों हिन्दुओं ने जान बचाने के लिये धर्मांतरण कबूल कर लिया।

कांग्रेस इस हिन्दू नरसंहार को हिन्दू मुस्लिम एकता बताती रही। गांधीजी तो और आगे चले गये उन्होंने अफगानिस्तान के सुल्तान को भारत पर आक्रमण के लिये आमंत्रित कर दिया। (https://www.facebook.com/swa.savarkar/photos/a.649292688431844/3067801896580899/) हिन्दुओं के पक्ष में एकलौती मुखर आवाज़ उस समय एनी बेसेंट थी जिन्होंने हिन्दू नरसंहार के लिये कांग्रेस को जमकर फटकार लगाई। इस कांड के बाद दुखी मन से डॉ हेडगेवार ने कांग्रेस छोड़ दी और अपने जीवन का एक ही लक्ष्य बना लिया हिन्दुओं का संगठन खड़ा करना जिसके परिणाम में संघ बना हालांकि वो बाद में भी कांग्रेस के नेतृत्व वाली आजादी की लड़ाई से जुड़े रहे।


50 साल की सजा पाये सावरकर ने जेल में रहते हुए तुर्की के लिये भारत में हिन्दुओं का नरसंहार करते भारतीय मुसलमानों को देखकर अपनी प्रसिद्ध किताब हिन्दुत्व लिखी जिसमें उन्होंने पृितभूमि और मातृभूमि वाला कॉन्सेप्ट दिया।

क्योंकि खिलाफत आंदोलन चाहे तुर्की के लिये ही सही अंग्रेजों के खिलाफ था इसलिये कांग्रेस सरकारों ने इसे इतिहास में मोपला विद्रोह लिखवाया और क्योंकि इस कथित विद्रोह को कांग्रेस का समर्थन था इसलिये ये हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक बन गया। इस आंदोलन से जुड़े सारे बड़े मुस्लिम नेता आगे चलकर पाकिस्तान बनाने में काम आये।

रह गये सावरकर जो इस सेक्युलरिज्म में फंसे नहीं उन्होंने जेल में मोपला नाम का नॉवल लिखा जिसमें उन्होंने बताया कि खिलाफत आंदोलन में आखिर हुआ क्या था और ये सच लिखने के लिये आज तक कांग्रेस और मुसलमानों से गाली खाते हैं।

इस हिन्दू नरसंहार को इस साल 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं। कोई और समाज होता तो चिंतन करता, अपने मारे गये लोगों को याद करता, यहुदियों की तरह इन लोगों की याद में कोई मेमोरियल, कोई म्यूजियम कुछ बनवाता लेकिन हर पन्ने पर नरसंहार और मंदिर टूटने और अपनी खोपड़ियों की मिनारें देखने के आदी हिन्दू इस नरसंहार को ऐसे भूले जैसे ये कभी हुआ ही नहीं।

कभी केरल में तुर्की के लिये भारतीय मुसलमानों ने हिन्दुओं का नरसंहार किया था आज केरल से मुसलमान अफगानिस्तान जाकर आतंक फैला रहे हैं। तुर्की में 100 साल के बाद फिर खिलाफत राज जाग रहा है जिसके लिये फिर भारतीय मुसलमानों का दिल भी धड़क रहा है।

तय हिन्दुओं को करना है 100 साल में वो कितना समझे हैं, कितना चले हैं...

शत शत नमन उस नरसंहार में मारे गये सभी हिन्दुओं को, काश आपकी याद में हिन्दुओं ने एक स्मारक ही बनाई होती लेकिन उससे धर्मनिरपेक्षता खतरे में आ जाती। 

ये सभी जानकारिया बहुत सी इतिहास की किताबो को खंगालने के बाद लिखा है (https://www.facebook.com/permalink.php?id=230121640861896&story_fbid=774660793074642), अपने विचार कमेंट  है। 

Saturday, August 1, 2020

अतीत की कुछ यादें जो याद आ गयी

अगर देश दुनिया में  कोरोना के कारण lockdown नहीं होता तो शायद हम जैसे मनुष्यो को कभी भी आत्मचिंतन के लिए इतना समय नहीं मिलता, न ही हम ये सोच पाते की वास्तव में हम क्या पाने के लिए क्या क्या खोते जा रहे है, और जो पा रहे है वो किसी काम का भी या बस यूँ ही लगे पड़े है, और जो खो रहे है वो कितने काम का है या फिर वही सिर्फ काम का है। 


आज बच्चे पढ़ रहे है, तो हम देख रहे है की घंटो कंप्यूटर और मोबाइल पर पढ़ रहे है, उनको हाई स्पीड कंप्यूटर, स्मार्ट फ़ोन और इंटरनेट भी चाहिए तब वो पढ़ रहे या यूँ कहे की उनको और हमको दोनों को इस हाई टेक पढ़ाई के नाम पर मुर्ख बनाया जा रहा है, लेकिन फिर भी बच्चे खुश है और हम भी बहुत गर्व से कहते है की बच्चो की ऑनलाइन क्लास चल रही है इसलिए उनको डिस्टर्ब मत करो, ये कह कर हमने ना जाने कितने लोगो को घर आने से रोका है और न जाने कितनो ने हमे रोका। 

और जब हम अपना बचपन याद करते है पढ़ाई वाला तो याद आता है की हमने पांचवीं तक स्लेट की बत्ती को जीभ से चाटकर कैल्शियम की कमी पूरी की, और ये हमारी ही नहीं सभी मित्रो की स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें।

आज बच्चो सरस्वती माता, विद्या माता जैसी माताओ का कतई पता नहीं है, उनको अपनी माता में ही दोस्त दीखता है, और कक्षा पांच में तनाव का आलम ये है की बच्चे खुद बोलने लगे एक तो हम टेंसन में है और आपको गाने की पड़ी है, आज के बच्चे टेंसन में गेम खेलते या फिर माल जाने की बात करते, वंडर वर्ड, वाटर पार्क स्ट्रेस मैनेजमेंट के लिए बच्चो के स्कूल खुद रिकमंड करते है, ऐसा नहीं था की हमे इस उम्र में टेंसन नहीं था लेकिन सिर्फ पढ़ाई का था और उस पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था।

उस समय के हमारे पढ़ाई या क्लास  बढ़ने के अपने स्वस्वीकृत टोटके होते थे, जो शायद सबके होते थे लेकिन फिर भी हमे विस्वास होता था की काम हमारे वाला ही करेगा, जैसे "पुस्तक के बीच विद्या पौधे की पत्ती (ये तो अब गॉव में नहीं मिलती है, इसकी पत्तिआ छुई मुई जैसी होती है) और मोरपंख रखने से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा दृढ विश्वास था, और ये काम भी करता था ।

हमारी तत्कालीन समय में कुछ रचनात्मक कार्य भी होते थे जैसे कपड़े के थैले (जो अकसर पिता जी के पुराने पेण्ट से माता जी घर पर ही सिलती थे ) में किताब कॉपियां जमाने का विन्यास हमारा रचनात्मक कौशल था, और आज रचनात्मक खेलो की भरमार है, और एक एक खेल १०००-१००० रूपये का, जिसमे रंग बिरंगी गीली मिटटी के भांति भांति की चीजे बनाना, प्लास्टिक पजल, इत्यादि इत्यादि, बच्चो को सभी किताबे कपिया स्कूल ही देता है फुल्ली डेकोरेटेड और हमारे लिए हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था।

आज स्कूल में PTM होता है, जिसका सम्पूर्ण नाम पेनेट्स टीचर मीट है, और इसमें मास्टर क्या प्रिंसिपल क्या दोनों ही इतनी मोटी फीस लेने के बाद सम्पूर्ण आत्मविश्वास किन्तु निर्लज्जता से कहते है, आपका बच्चा सही परफॉर्म नहीं कर रहा है, आप घर पर ध्यान दीजियेगा, हमारे पास तो ६ घण्टे के लिए आता है, बच्चा तो आपका है आपको ही इसके करियर की चिंता करनी है और भी न जाने क्या क्या और हम सब मिटटी के माधव बनकर सुनते है और चले आते है, और हमारे समय में माता पिता को हमारी पढ़ाई की कोई फ़िक्र नहीं थी, न हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर बोझा थी। सालों साल बीत जाते पर माता पिता के कदम हमारे स्कूल में न पड़ते थे, और हमे नहीं याद है किसी स्कूल में हमारे मातापिता को नियमित बुलाकर ऐसे बोला गया होगा। 

आज बच्चो के खेलने की बहुत सुविधाएं है, बैटरी से चलने वाली बाइक, कार, पांडा सब है, जिसपर उनको कतई कोई दिक्कत नहीं होती है चलाने में और मजाल है अपनी बाइक, कार या पांडा पर किसी और को बिठा ले या किसी दोस्त को दे दे, और हमारे समय में, सबसे पहले छुपते छुपाते सायकल को कैंची सीखते थे (इसकी तो कल्पना करना भी शायद बच्चो के लिए मुश्किल होगा) और दोस्ती का आलम ये था की एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा हमने कितने रास्ते नापें हैं। 

आज हम अपने बच्चो को जरा सा मार दे तो अजीव सा वातावरण उत्पन्न कर देते है, और स्कूल वाले तो अब इस कला परम्परा को खो ही चुके, वही बच्चो को मार पीट चाइल्ड एब्यूज का पाठ पढ़कर हाई मेनर्ड बना रहे है, और एक हम लोग थे जिनका स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते कभी ईगो परेशान नहीं करता था, दरअसल हम जानते ही नही थे कि ईगो होता क्या है ?

तत्कालीन समय में पिटाई हमारे दैनिक जीवन की सहज सामान्य प्रक्रिया थी, "पीटने वाला और पिटने वाला दोनो खुश थे",  पिटने वाला इसलिए कि कम पिटे, पीटने वाला इसलिए खुश कि हाथ साफ़ हुवा, उस पर पिता जी मित्र कुछ ऐसे नमूने थे जो नियमित ज्ञान देते थे, आप अपने बेटे को रोज कूटो, आपको भले ही न पता हो उसने क्या गलती है लेकिन उसे जरूर पता होगा की उसने क्या गलती की और वो पिटाई की हिसाब से खुद एडजस्ट कर लेगा, और आज ऐसी सलाह कोई नहीं देता। 

आज के बच्चो में एक बहुत बढ़िया बात है, वो आपको याद दिलाते रहते है की वो आपसे कितना प्रेमा करते है, कभी You  are the best papa of world कह कर, कभी i love you papa, कभी  I miss you papa कह कर, कुल मिलकर ये शब्द आपको उनके लिए और ज्यादा मेहनत करने को प्रेरित करते रहते है और शिस्ट और शालीन बने रहने की प्रेरणा देते है और एक हम अपने माता पिता को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं,क्योंकि हमें "आई लव यू" कहना नहीं आता था।

पर सच में इस अवसर खोजी दुनिआ और औपचायकताओ से भरे हुए रिश्ते हम लोग ही तो लेकर आये है, हमे तो निश्छल रिश्ते मिले थे उसमें फायदा नुकशान तो हमने देखा, हमे तो मिटटी के घर मिले थे जिसमे बिना दीवार सब एक साथ रहते थे पक्के घर और दीवारे तो हमने बनायीं थी, हमे तो चचा, ताऊ, बुआ, मामा मौसी सब रिश्ते मिले थे, एकल परिवार तो हमने किया कुछ पैसे बचाने के लिए, अब !

अब पछताने से क्या होगा, जो बोया है वही दिख रहा है, अब न तो इसे बदल सकते है और न ही बच सकते है, भुगतो और ऐसे कहानिया लिखकर मन को बहलाओ 

Wednesday, April 15, 2020

The truth of false castism in India

एकलव्य ने अपना अंगूठा काटा था तो द्रोणाचार्य भी मात्र एक चुल्लू दूध के लिये तरसे थे, अपमानित भी किये गये थे...

उस युग में एक ही अपराध के लिये ब्राह्मण को किसी शूद्र की अपेक्षा सोलह गुना अधिक दंड भी मिलता था... क्योंकि समझा जाता था कि ब्राह्मण ज्ञानी है और जानकर किया गया अपराध अज्ञानता में किये गये अपराध से अधिक दंडनीय है...
इस लिहाज से तो महाभारत काल ब्राह्मण विरोधी हो गया और "मनुस्मृति" भी ब्राह्मण विरोधी ही हुई फिर...
उसी युग में एक मछुआरन की संतान "वेदव्यास" ने "महाभारत" लिखी थी, और "त्रेतायुग" में "वाल्मीकि" ने "रामायण" लिखी थी...

जब एकलव्य की जाति बताते हो तो क्षत्रिय भीम की पत्नी हिडिम्बा की जाति भी बता दो और ये भी बता दो कि उसी हिडिम्बा के पोते "खाटू श्याम जी" को साक्षात् श्रीकृष्ण भगवान् की तरह पूजा क्यों जाता है...?

न्याय-अन्याय हर युग में होते हैं और होते रहेंगे, अहंकार भी टकरायेंगे...कभी इनका तो कभी उनका...यह घटनायें दुर्भाग्यपूर्ण होती हैं पर उससे भी दुर्भाग्यपूर्ण होता है इनको जातिगत रंग देकर उस पर विभाजन की राजनीति करके राष्ट्र को कमजोर करना...

यदि किसी ने भीमराव का अपमान किया तो किसी सवर्ण ने ही उनको पढ़ाया भी था और किसी सवर्ण ने अपना सरनेम आम्बेडकर भी दिया तो किसी ने चुनाव हारने पर राज्यसभा भी पहुचाया...किसी एक घटना को अपने स्वार्थ के लिए बार-बार उछालना और बाकी घटनाओं पर मिट्टी डालना कौन सा चिंतन है ?

सवर्ण क्षत्रिय नंदवंश का समूल नाश कर चंद्रगुप्त नाम के शूद्र पुत्र को चक्रवर्ती सम्राट् बनाने वाला चाणक्य कौटिल्य नाम का ब्राह्मण ही था...

यह दलित चिंतन नहीं है यह केवल राष्ट्रद्रोहियों द्वारा थोपा हुआ दोगला चिंतन है जो बँटवारे की राजनीति करते हैं...

Saturday, March 28, 2020

CoronaVirus the weapon of china for economic victory over world

उसने सबसे पहले कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाई और तब तक अपने फ्रिजों में रखी जब तक पूरे विश्व की आर्थिक अर्थव्यवस्था को पाताल में नहीँ उतार दिया। चीन पूरी दुनिया के इन्वेस्टर्स का हब बन गया था।

चीन ने अपने वुहान शहर में इस वायरस को छोडा और जबरदस्त मौतों के कारण भागते इन्वेस्टर्स के शेयरों को कौडी के भाव खरीद लिये और विदेशी निवेशक और उद्यमी अपनी पूंजी छोड़ कर भाग गये चीन ने अपने द्वारा पहले से बनाई और छुपा कर रखी गई वैक्सीन को बाहर निकाल लिया और एक ही दिन में चीन हो रही मौतों को रोक दिया। इस युद्ध में चीन ने अपने कुछ लोग खोये पर पूरी दुनिया की दौलत लूट ली।

आज वहाँ एक भी मौत नहीँ हुई और न ही एक भी मरीज की संख्या बढी ।

आज ये वायरस पूरी दुनिया में काल की तरह चक्कर लगा रहा है।

कमाल ये भी देखिये उन सभी देशों और शहरों की कमर टूट गई है जहाँ पर चीनी नागरिक खर्च करते थे।
आज पूरा विश्व हर रोज अपनी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त होते देख रहा है। पर 17 मार्च सै चीन की अर्थव्यवस्था दिनों दिन मजबूत हो रही है।

ये एक आर्थिक युद्ध है जिसमें चीन जीत चुका है और विश्व कुदरत से युद्ध करते करते रोज अपने जान माल को गंवा रहा है।

ये भारत के लोगों का इम्यून है कि वह हर संकट में कुशल यौद्धा की तरह लडता है और जीतता है....... हमारे देश के अधिकांश नागरिक इकनोमी के आकंडो में नहीँ फसते, पत्थर में से पानी निकालने की कुव्वत रखते हैं। हम भारतीय बडे से बडे रोग को रोटी के टुकड़े में लपेट कर खाने और पचाने में माहिर हैं। हम कभी कुदरत के विरुद्ध युद्ध नहीँ करते बल्कि उसकी पूजा करते हैं।

हम भारतीय मन्दिरों ,गुरुद्वारों से आवाज दे दे कर बुलाते हैं ईश्वर को रिझाते हैं अतः वो ईश्वर हमारा अनिष्ट कर ही नहीँ सकता।

पर हर भारतीय को याद रखना चाहिए कि चीन और चीनी इस कुदरत के खल नायक है इनसे हर प्रकार की दूरी बनाए रखें।

कोरोना वायरस को लेकर चीन की भूमिका पर 10 महत्वपूर्ण सवाल -

  • जहां पूरी दुनिया इससे प्रभावित हो रही है, वहीं चीन में वुहान के अलावा यह क्यों कहीं नहीं फैला? चीन की राजधानी आखिर इससे अछूती कैसे रह गयी?
  • प्रारंभिक अवस्था में चीन ने पूरी दुनिया से इस वायरस के बारे में क्यों छुपाया?
  • कोरोना के प्रारंभिक सैंपल को नष्ट क्यों किया?
  • इसे सामने लाने वाले डॉक्टर और पत्रकार को खामोश क्यों किया? पत्रकार को तो गायब ही कर दिया गया है?
  • दुनिया के अन्य देशों ने जब सूचना साझा करने को कहा तो उसने सूचना साझा क्यों नहीं किया? मना क्यों किया?
  • कोरोना मानव से मानव में फैलता है, इसे छुपाने के लिए WHO के कम्युनिस्ट निदेशक का उपयोग क्यों किया गया? WHO के निदेशक जनवरी में "बीझिंग (चीन)" में क्या कर रहे थे ..... ??(प्लान फिक्सिंग कर रहे थे क्या?)
  • WHO 11 जनवरी तक यह ट्वीट क्यों करता रहा कि .. "किसी भी अंतरराष्ट्रीय उड़ान के लिए कोई गाइडलाइन जारी करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह मानव से मानव में नहीं फैलता है" .... ??? आज साबित हो गया कि कोरोना मानव से मानव में फैलता है... तो फिर WHO ने झूठ क्यों बोला ??
  • वुहान से एकसाथ 50,00,000 लोगों को बिना मेडिकल जांच किए "दुनिया के अलग-अलग हिस्से में" क्यों भेजा गया ..??
  • इटली में 6 फरवरी तक मामूली केस था। एकाएक चीनी 'हम चीनी हैं वायरस नहीं, हमें गले लगाइए।' प्लेकार्ड के साथ दुनिया के पर्यटन स्थल 'सिटी ऑफ लव' के नाम से मशहूर इटली के लोगों को गले लगाने क्यों पहुंचे ??
  • पूरी दुनिया आज चीन और WHO को संदेह की नजर से देख रही है और ताज्जुब देखिए कि एक ही दिन चीन और WHO, दोनों भारत की तारीफ में उतर आए! क्या यह महज संयोग है?
  • और इसके अगले ही दिन भारत में चीन के राजदूत ट्वीट कर उम्मीद करते हैं कि भारत इंटरनेशनल कम्युनिटी में उसकी पैरवी करे। आखिर क्यों? नेहरू की एक गलती का खामियाजा हम भुगत चुके हैं। यह मोदी सरकार है, और उम्मीद है वह कम से कम वह गलती तो नहीं ही दोहराएगी?
  • सार्क से लेकर G-20 तक की बैठक पीएम मोदी के कहने पर हो रही है‌। संकट के समय भारत वर्ल्ड लीडर के रूप में उभरा है। इटली, जर्मनी, स्पेन, फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका तक जब कैरोना से निबटने में असफल हो रहे हैं तो पीएम मोदी की पहल पर भारत इससे कहीं बेहतर तरीके से डील कर रहा है।
  • चीन इसी का फायदा उठाकर यह चाहता है कि भारत इंटरनेशनल कम्युनिटी में उसके अछूतपन को दूर करे।

अब यह नहीं होगा। चीन संदेह के घेरे में है और रहेगा! कृपया इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें!
Disclaimer : मुझे नहीं पता ले लेख किसने लिखा है, लेकिन पढ़ने के बाद लगा की ये एक षड्यंत्र है देश के विरुद्ध, मुझे यह व्हाट्सअप और फेसबुक के माध्यम से प्राप्त हुआ है, लेकिन तथ्य एकदम सत्य है, जो नकारे या झुठलये नहीं नहीं जा सकते है।

Conspiracy behind moving from Delhi due to CoronaVirus

जैसा की हम सब अब जान ही गए है की कोरोना  चीन द्वारा निर्मित जैविक हथियार है जिसका उपयोग उसने अपनी भविष्य में गिरने वाली अर्थव्यस्था को मेडिकल के सामान बैच कर दुरुस्त करने के लिए प्रयुक्त किया है।
लकिन उसके पहले दाव भारत पर मोदी जी के कुशल नेतृत्व के कारण असफल हो गए तो उसने भारत के बहुत बड़े लेकिन जल्दी ही निराशा और भयभीत होने बाले बहुसंख्यक वर्ग को टारगेट किया है उसके लिए उसने भारत  ही देशद्रोही मीडिया और वामपंथी किन्तु छद्म उदारवादी और बुद्धिजीवी वर्ग  सहारा लिया और
इन्होंने ही अफवाह फैलाई कि लोकडाउन 3 से 6 माह चल सकता है। मजदूरों का पलायन और उस पर टीवी चैनल्स के समाचार, गरीबों की चिंता, भूख का व्यापार... केजरीवाल ने दिल्ली दंगों की ही तरह लम्बी ओढ़ ली है। पर्दे के पीछे टुकड़े गैंग सक्रिय हैं।

बसों में भरकर मजदूर यूपी बॉर्डर पर छोड़े जा रहे हैं।
मित्र पुष्पेंद्र सिंह लिखते हैं। ,
6 हफ्ते गुजर गए,
800 के आस-पास कोरोना संक्रमित, लगभग 20 की मौत उसमें भी 80% की मुख्य वजह कोरोना नहीं,ऊपर से 135 करोड़ की आबादी का देश,
ये तो चीन निर्मित "बायलोजिकल हथियार" की घोर बेइज्जती थी देवभूमि भारत में,,
जहाँ एक तरफ कुछ दिनों तक चीनी वायरस चीनी वायरस चिल्लाने वाला सुपर पावर अमेरिका सरेंडर कर शैतान जिंगपिंग की तारीफ़ पर उतर आया तो वहीं दूसरी तरफ कोरोना के कहर के कराह रहा पूरा यूरोप भारी खरीददारी कर रहा था चीन से,
परंतु ये क्या,
दुनिया की सबसे बड़ी मार्केट घांस नहीं डाल रही थी, शैतान चीन के माथे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट दिखने लगीं, उसे लगा कि उसका मिशन सिंहासन (((कोरोना))) तो फेल ही हो जायेगा यदि भारत उसकी शरण में नहीं आया तो,

वहीं दूसरे ही स्टेज में एक दिन का जनता कर्फ्यू फिर 21 दिनों का लाकडाऊन कर पूरा देश अपने नायक के पीछे चल रहा था,
अतंत: चालाक चीन ने अपना आखिरी पासा फेंका, और भारत की सबसे कमजोर नस को दबा दिया,
जी हां,
उसने खोला अपने खजाने का मुंह और खरीद लिया देश के कुछ बड़े देशद्रोही पत्तलकारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ चैनलों को,
जगा दिया वामपंथ के स्लीपर सेल्स को,पहले 21 दिनों तक गरीब दिहाड़ी मजदूर कैसे रहेंगे,का रोना रोया जाना शुरू किया गया फिर एक-दो परिवारों की पैदल यात्रा का 24 घंटे एैसे कवरेज किया जाने लगा कि जैसे पूरा देश ही पैदल चल पड़ा,
फिर धर्म के नाम पर एक संप्रदाय विशेष को मोर्चे पर लगा दिया गया, अब ये चाल सफल होती दिख रही है, कुछ झूठे नक्सली नेता आम मजदूरों को भड़का कर की 6 महीने का कर्फ्यू लगने वाला है ,बसों से दूसरे प्रदेश की सीमाओं तक लाखों मजदूरों को छोड़ने लगे,और सफल कर दिया शैतान की चालों को,
देश को बैठा दिया जाग्रित ज्वालामुखी के मुहाने पर,
वहीं पैदल मार्च करने वालों के लिए कुछ लोगों की छाती में दूध उतर आया जो सोशल मीडिया पर सिर्फ विरोध के नाम पर विरोध करते रहते हैं,
जब देश युद्ध या किसी बड़े संकट में फंसता है तो हर नागरिक युद्ध का हिस्सा होता है, हर नागरिक को परेशानी उठानी पड़ती है, हर नागरिक को त्याग करना पड़ता है, युद्ध सिर्फ सेनायें ही नहीं लड़ती हैं,
परंतु गद्दारों और बिकाऊ लोगों की प्रचुर उत्पादकता से गमगीन ये देश एैसी परिस्थिति का हर समय से ही सामना करता आया है,
सुनों हम फिर भी जीत जायेंगे,हमने विश्व विजेता सिकंदर को उल्टे पांव वापस किया है,हम शैतान चीन की हर चाल का जबाब देंगे वो भी भरपूर,
परंतु देश के अंदर ही कुछ लोग और संस्थायें एक बार फिर सड़कों पर नंगी हो रही हैं जिन्हें देखना और सुनना बहुत कष्टदायक है,!!!

Disclaimer : मुझे नहीं पता ले लेख किसने लिखा है, लेकिन पढ़ने  के बाद लगा की ये एक षड्यंत्र है देश के विरुद्ध, मुझे यह व्हाट्सअप और फेसबुक के माध्यम से प्राप्त हुआ है, लेकिन तथ्य एकदम सत्य है, जो नकारे या झुठलये नहीं नहीं जा सकते है।