Official Blog of Ambrish Shrivastava

Monday, September 20, 2021

Caste untouchability : Legislation of a rumor based narrative

#जातिगत_छुआछूत : एक अफवाह आधारित नैरेटिव का विधानिकरण है जिसको 1936 के बाद गढ़ा गया है।

क्या इस बात के प्रमाण हैं?
जी हां हैं।
दरअसल एक ही चीज को कई दृष्टियों से देखा जा सकता है। जो जैसी दृष्टि वाला होगा वैसी ही चीज उसे दिखायी देगा। अमिताभ बच्चन की एक फ़िल्म है जिसमें वह हाँथ में 6 लिखकर अपने बेटे से पूंछता है कि क्या लिखा है। वह कहता है 9। अमिताभ कहता है कि मुझे तो 6 दिख रहा है।

1850 के बाद 1857 का संग्राम हुवा था - भारत की लूट तथा भारतीय उद्योगों व्यापार और शिल्प को नष्ट किये जाने के कारण। जिससे करोड़ो लोग बेरोजगार हुए और भुखमरी तथा संक्रामक महामारियों के शिकार होकर मौत के मुंह में समाने लगे। 1857 की लड़ाई में दो प्रतीक थे - कमल और रोटी। यह प्रतीक हिन्दू और मुसलमान दोनों को स्वीकार्य थे। कमल भारत का प्रतीक था, और रोटी प्रतीक थी अंग्रेजो के लूट के कारण बेरोजगारी भुखमरी और मृत्यु का। वरना रोटी का क्या अर्थ था?

वैसे तो मैं लगभग सात साल से कहता आ रहा हूँ कि तथाकथित छुआछूत 1850 के बाद की उत्पत्ति है।

#Covid19 के कारण लोग इसे अधिक अच्छे से समझ सकते हैं।

संक्रामक बीमारियों से बचने के लिए हिन्दू समाज ने शौच ( सैनिटेशन) और परहेज ( फिजिकल डिस्टनसिंग) अपनाना शुरू किया। इसे अंग्रेजो ने Untouchability बोलना शुरू किया। साथ में इसे हिन्दू धर्म का अमानवीय स्वरूप बताकर व्याख्या करना शुरू किया। आज आप विश्वास कर सकते हैं कि प्रोपगंडा साहित्य किस तरह पढ़े लिखे लोगों का माइंड सेट करता हैं।

Untouchability की हिंदीबाजी है - छुआछूत। यदि यह संस्कृत हिन्दू धर्म का अंग होता तो किसी न किसी ग्रन्थ में छुआछूत का वर्णन होता। शौच का वर्णन अवश्य हर ग्रन्थ में है। 6 और 9 समझने के भेद को सम्भवतः आप समझ सकें अब।

दूसरा प्रश्न उठता है कि चलो माना कि छुआछूत का जन्म भुखमरी महामारी और संक्रामक रोगों के कारण हुवा। तो यह जातिगत कैसे हो गयी?

बहुत अच्छा प्रश्न है।

इसका उत्तर आसान है। यह जातिगत कभी भी नहीं थी। इसका प्रमाण है डॉ अम्बेडकर द्वारा 1932 में प्रस्तुत की गयी लोथियन समिति की रिपोर्ट। इस रिपोर्ट में 1911 की सेंट्रल प्रोविंस के जनगणना अधिकारी Mr ब्लंट का जिक्र है जिसमें तीन कास्ट्स की जनगणना का डेटा है जिनमें Touchable भी हैं और Untouchable भी। अब इन दो शब्दों को हिन्दू ग्रंथो में खोजना और भी कठिन है - सछूत और अछूत। 1911 की जनगणना में अछूत का क्राइटेरिया है - "Pollution by Touch" - छूने के कारण दूषित होना। आखिर और क्या चल रहा है कोविड काल मे? यही तो बचाने की बात पूरी दुनिया के शासक, डॉक्टर और WHO कर रहे हैं न ।

डॉ आंबेडकर 1932 में कहते हैं कि ब्लंट को असली बात समझ में नहीं आयी। दरसअल उसे हिन्दू धर्म का ज्ञान नहीं था। फिर अपना तर्क देते हैं कि कास्ट और अछूतपन हिन्दू धर्म की आधारशिला है। वे यह नहीं बताते कि किस ग्रन्थ में उन्होंने ऐसा पढा था। कोई आवश्यकता नहीं थी। फिर अम्बेडकर कहते हैं कि सछूत को भी अछूत माना जाना चाहिये। अब यह उनके मन की कपोल कल्पना थी या अंग्रेजो के कहने पर उन्होंने ऐसा लिखा, यह जांच का विषय है। अंधों को क्या चाहिए दो आंखें। अंग्रेजो को यह बात पसंद आ गयी।

फिलहाल तब तक अछूतपन जाति आधारित नहीं था, यह बात प्रमाणित हो गयी।

1936 में रानी विक्टोरिया का एक शासनादेश आया कि निम्नलिखित 429 कास्ट्स शेड्यूल के अंतर्गत आती हैं। न इससे कम न इससे अधिक। शेड्यूल का अर्थ क्या था? क्यों यह 429 जातियां शेड्यूल की जा रही हैं। कुछ भी नहीं लिखा गया उस शासनादेश में।

लेकिन ब्रिटिश और भारतीय विद्वानों ने इसको एक्सप्लेन किया कि यह लिस्ट अछूत जातियों की है। तभी से अछूतपन जातिगत हो गयी।

मेरी अनेक पोस्टों में लोगों ने इस विषय पर प्रश्न उठाये थे। आशा है कि उनको अपने प्रश्नों का उत्तर मिल गया होगा। और भी जिज्ञासायें हों तो खुलकर लिखें। इस विषय का मैं अकेला एक्सपर्ट हूँ स्वतंत्र भारत के इतिहास में।

अम्बेडकर जी द्वारा प्रस्तुत की गयी रिपोर्ट से सछूत और अछूत जातियों का उद्धरण निम्नलिखित है।

Main post - https://www.facebook.com/Hiteshbhai.Bhanushali/posts/4339712756093940

Sunday, September 5, 2021

फिल्म जिहाद - ज़ावेद अख्तर पर एक नजर

क्या बॉलीवुड मे सच मे फिल्म-जिहाद अथवा बॉलीवुड-जिहाद जैसा कुछ है ? इस तथ्य को उजागर करते कुछ सत्य..
 
ज़ावेद अख्तर ने 1970 से 1982 तक लेखक सलीम के साथ जोड़ी बनाकर 24 बम्बईय्या फिल्मों की कथा-पटकथा लिखी। इनमें से अधिकांश फिल्में मारधाड़ वाली अपराध कथाओं, अपराध जगत (अंडर वर्ल्ड) पर ही आधारित थी।
इस कालखंड के दौरान बम्बई पर 5 अपराधियों का सिक्का चला। ये 5 अपराधी थे हाजी मस्तान, यूसुफ पटेल, करीम लाला वरदराजन मुदलियार और दाऊद इब्राहीम। इनमें से 4 मुसलमान थे। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि इन चारों अपराधियों के 80 प्रतिशत अपराधी गुर्गे भी मुसलमान ही थे। लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि उसी दौरान उसी बम्बई में रहते हुए ज़ावेद अख्तर और सलीम ज़ावेद ने जिन 24 फिल्मों की कथा-पटकथा लिखी उनमें से एक भी फ़िल्म का खलनायक (विलेन) पात्र मुसलमान नहीं था।
 
यह तथ्य बताता है कि अपनी फिल्मों के पात्र कौन सी सेक्युलर दुनिया से और किस सेक्युलर दृष्टि से ढूंढता था जावेद अख्तर। इसी सेक्युलर जावेद अख्तर द्वारा लिखी गई दीवार फ़िल्म से सम्बंधित कथा-पटकथा के उस तथ्य से तो सभी परिचित हैं कि फ़िल्म का नायक जो हिन्दू है वो इस हद तक नास्तिक है और हिन्दू धर्म से इतनी घृणा करता है कि मंदिर की सीढ़ियों तक पर पैर नहीं रखता। भगवान के प्रसाद तक को हाथ तक नहीं लगाता। लेकिन वही नास्तिक हिन्दू नायक एक इस्लामी धार्मिक प्रतीक 786 नंबर के बिल्ले की भक्ति में हर समय इतनी बुरी तरह बौराया रहता है कि हगते मूतते समय भी उसे अपने कलेजे से लगाए चिपकाए रखता
 
1983 से 2006 तक इसी जावेद अख्तर ने 14 और फ़िल्मों की पटकथा लिखी लेकिन भयंकर आश्चर्य की बात है कि उन 14 फ़िल्मों में भी खलनायक तो छोड़िए, नकारात्मक चरित्र वाला एक भी पात्र मुस्लिम नहीं दिखाया गया है. यानि 1970 से 2006 तक, पूरे 36 बरस की समयावधि में कुल 38 फ़िल्मों की कहानियां लिखने वाले जावेद अख्तर की उन कहानियों में एक भी कहानी का खलनायक मुसलमान नहीं बना. जबकि उन फ़िल्मों में से लगभग 60% फ़िल्मों की कहानी तो शुद्ध रूप से क्राइमस्टोरी ही थीं. और इस पूरी समयावधि के दौरान मुम्बई में मुस्लिम गुंडों तस्करों हत्यारों आतंकियों का सिक्का कैसे चलता रहा था. यह पूरा देश जानता है. लेकिन जावेद अख्तर की हर कहानी का खलनायक हमेशा हिन्दू ही रहा. यह संयोग नहीं हो सकता. प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में कहूं तो ये संयोग नहीं प्रयोग ही था...

उल्लेख आवश्यक है कि ये ज़ावेद अख्तर पाकिस्तानी मुशायरों सेमिनारों सम्मेलनों के बहाने पाकिस्तान के अनेक दौरे दशकों से करता आ रहा है। लेकिन पाकिस्तान में हिन्दू सिक्ख ईसाई पारसी बौद्ध परिवारों पर पाकिस्तानी मुसलमान गुंडों द्वारा बरसाए जा रहे हत्या लूट बलात्कार के राक्षसी कहर के खिलाफ इसने कभी एक शब्द नहीं बोला। उनकी पीड़ा व्यथा कथा इसकी किसी कहानी या ग़ज़ल में कभी नहीं छलकी. लेकिन यही जावेद अख्तर CAA कानून का विरोध कर के उन्हीं कट्टर धर्मान्ध दंगाई पाकिस्तानी मुसलमान गुंडों को भारत की नागरिकता देने की जिद्द पर उतारू हो गया था. तीन चार दशक पहले वामपंथ की नकाब में वैचारिक धूर्तों-ठगों-जालसाजों के गैंग को फिल्म जिहाद की कमान सौंपी गयी.
 
7-8 साल पहले तक वामपंथ की नकाब वाले इन वैचारिक धूर्तों-ठगों-जालसाजों के गैंग ने देश के वैचारिक धरातल पर तानाशाह की तरह एकछत्र एकतरफ़ा राज किया। सत्तालोभी मूढ़मति कांग्रेसी फ़ौज़ इस वामपंथी वैचारिक कचरे की गठरी को दास भाव से कुलियों की तरह अपनी पीठ कंधे और खोपड़ी पर ढोती रही। लेकिन 7-8 साल पहले इस देश के आम आदमी को सोशलमीडिया का मंच मिला और उस मंच से आम आदमी द्वारा देश को जो सच सुनाए बताए जाने लगे उन सच की गर्जना से से वामपंथी वैचारिक काबे बुरी तरह ढहने लगे, उन काबों में भगवान बनाकर खड़े किए गए वामपंथी शैतानों के बुत जनता के हाथों उखड़ने लगे। उसी आम आदमी द्वारा ठोस सबूतों और तथ्यों के साथ देश को सुनाए बताए जा रहे सच की श्रृंखला की ही एक कड़ी है यह पोस्ट ...

Thanks Amar Mani Tripathi @ https://www.facebook.com/groups/123159648328614

Friday, June 18, 2021

आने दे तेरे पापा को

 २०२० में एक महामारी ने दस्तक दी और सबकुछ बंद बंद  सा  हो गया, एक इस बंद बंद ने बहुत सी नयी चीजे खोल दी, जैसे परिवार क्या होता है, अपने क्या होते, अपनों के साथ समय कैसे गुजरता है, और इसके अलाबा जो सबसे अच्छा हुआ वो ये था की बच्चो और पिता के बीच की खाई खत्म हो गयी, जो पिता के १०-११ घंटे बहार रहने और फिर घर आकर परेशानी के कारण एक लम्बे समय से चली आ रही थी, क्युकी बच्चे कभी पिता से इतने घुले मिले नहीं तो उनको कभी पता नहीं चला की उनका पिता उनसे कितना प्रेम करता है और जो भी करता है उनके उज्जवल भविष्य के लिए ही करता है। साथ ही मम्मी का एक डायलॉग भी बंद हो गया, आने दे तेरे पापा को तब पता चलेगा। 

क्यों थी बच्चो और पिता में दूरिया 

दूरियों का कोई कारण नहीं था, बस समय न दे पाना ही था, एक पिता सुबह ६ बजे उठा, दैनिक कर्म किये, नाश्ता किया बेग उठाया और चल दिया ऑफिस पुरे दिन ऑफिस का काम, तनाव, समस्या और गालिया खीज सब झेल कर घर बापस आया सुकून की तलाश में, लेकिन कई बार ऐसा हुआ की बच्चो की माँ दिन भर बच्चो के कई काम रोक कर रखे होती थी की पापा के आते ही करवाते है, और पिता आये ठीक हुए बच्चे लग गए अपनी ज़िद में तो शायद एक या दो बार समझाया भी होगा, लेकिन बच्चे तो बच्चे सुबह से इंतज़ार कर रहे होते है पापा का तो उनको तो अपनी चीज चाहिए उनको क्या पता की पापा किस समस्या से जूझ रहे है और परिणति गुस्से के रूप में होती, ये बात हम १० साल से कम उम्र के बच्चो की कर रहे है, और इसके बाद बच्चे दुखी हो जाते है और धीरे धीरे उनको लगता है की पापा का मतलब एक तानाशाह जो ये चाहता है की जब वो घर में आये सब शांत हो जाये, उसे पानी चाय दे, उससे कोई डिमांड न करे, कोई समस्या न बताये, लेकिन अब बच्चे क्या जाने की वो बाप पुरे दिन कितनी समस्याओ से जूझ कर आया है। 

दुसरो से संयमित होकर बोलना 

बहुत बार ऐसा होता है की बाप बच्चो पर चिल्ला चुका होता है और तभी बाहर से कोई आता है तो बाप अपना संयम रख कर बड़े प्रेम से बात करता है और उसे विदा कर देता है, या किसी का फोन आया तो बड़े तरीके से बात करता है, अब बच्चो को ये भी लगता है की हमसे ही चिल्ला कर बात करते है, बाहर वालो से देखो कैसे चासनी में समोय हुए बोलते है, अब उनको क्या पता की एक पिता का अपने परिवार को अपना समझ कर निर्द्वन्द होकर बोलना ही उसके अकेलेपन का कारण बनने वाला है, कई बार हम बाहर वालो से बहुत संयमित व्यवहार करते है लेकिन अपनों से फट पड़ते है, ये शायद ज्यादा अपनापन होने के कारण होता है की जो तनाव, कुंठा, परेशानी एक पिता दुसरो से छुपा कर रखता है उसकी गांठ अपने के भड़ाक से खुल जाती है और अपनों को लगता है की कितनी गुस्सा करता है, खैर ये तो समझना और समझाना बहुत मुश्किल है की लोग बाहर वालो पर कम और अपने परिवार के लोगो पर ज्यादा गुस्सा कर लेते है, शायद परिवार के साथ अहित करेगा ऐसा भाव नहीं होता इसलिए संयम और धैर्य टूट जाता है अप्रिय बात पर। 

क्या एक पिता वास्तव में अपने बच्चो को पीटना चाहता है ?

ये सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है, ज्यादातर मेने भी महशूस किया है की मेरे बच्चो का स्कूल सुबह का होता था तो मेरे ६ बजे उठने के बाद उनका भी उठना होता है, नाश्ता और स्कूल चले गए, फिर हम ८ या ९ बजे निकले, बच्चे आ जाते है २ बजे और हम आते है ७ बजे, वो भी थके हुए, १ घंटा हमे चाहिए खुद को रिफ्रेश करने को तो बज गए ८, अब ८ बजे अगर मौका मिल गया था टीवी देख ली जैसे समचार या फिर कोई धारावाहिक, इसके बाद भोजन बज गए ९, इसके बाद ज्यादातर होता है हमारे प्राइवेट सेक्टर में की कुछ न्य सीखो तो ३० से ४० मिनट उनके लिए निकाल लिए, फिर बच्चो या फिर यूँ कहो की परिवार के साथ थोड़ा समय गुजारा और सो गए क्युकी सुबह उठना भी है, अब इस पुरे क्रिया कलाप में एक पिता को क्या पता चलेगा की दिन भर उसके बच्चो ने  की, हद से हद होमवर्क देख सकता है, स्कूल की डायरी देख सकता है, थोड़ा बहुत पूछ सकता है, फिर बच्चो को पीटने की बजह क्या है उसके पास, सोचिये पुरे दिन में बमुश्किल वो अपने बच्चो के साथ ३ घंटे गुजारता है तो उसे हरकतों के बारे में क्या पता ?

किसने बनाया बाप को खलनायक ?

अब सवाल उठता है की बाप को बच्चो की नजर में खलनायक किसने बना दिया ? जैसा की हमने ऊपर ही कहा है की पिता ऑफिस से थक कर आया, उसे पानी चाय मिलना चाहिए, लेकिन बजाय उसके अगर शिकायतों का पुलिंदा मिल जाए तो शायद खीज बढ़ जाएगी, और बच्चो को एक रेप्टा भी पड़ जाय, वास्तव में ये रेप्टा इतना दर्द नहीं देता जितना दर्द देता है बच्चो को इसके पीछे की भूमिका, बच्चे घर आकर होमवर्क करेंगे फिर करेंगे शैतानी, या किसी चीज की डिमांड जिसे चाहे तो माँ भी देख कर सेटल कर सकती है, लेकिन कई बार वो भी घर के काम में इतनी व्यस्त होती है की उस समय थोड़ा शांति मिल जाय तो डराने के लिए कह देती है आने दो पापा को तुम सबकी शिकायत करुँगी तब पता चलेगा या फिर पापा को आने दो तब दिलवा देंगे। 



लेकिन वास्तव में कई बार ऐसा होता है की बापू घर तो आये लेकिन दिल दिमाग फेफड़े गुर्दे धड़कन सब ऑफिस के किसी प्रोजेक्ट में अटका है तो सोचते है की घर जाकर काम करुगा और कल ऑफिस में अपनी इज्जत बचा लूंगा, और घर आये तो धर्मपत्नी शुरू हो गयी शिकायतों में, अब बापू को भी जल्दी की छुटकारा मिले और काम करे जिससे कल बेज्जती न हो तो पूरी बात सुने बिना है रेप्टा घर दिया बच्चे को, जो शायद पत्नी की उम्मीद से भी परे था, अब बच्चा जाय तो कहाँ ?  आ गया मम्मी के पास और मम्मी क्या करे, बच्चे को शांत करने के लिए किसकी साइड ले ये डिसाइड करना भी कठिन है। 

फिर भी कुछ रटे रटाये डायलॉग हमे भी याद है, तेरे पापा है ही ऐसे ऑफिस का गुस्सा घर पर निकालते है, अरे समझा देते मारने की क्या जरूरत थी, जाने तो पापा को ये तो गुस्सा ही कर पाते है कल हम चलेंगे बाजार ले आयेगे और बच्चे को लगा की बाप तो है तानाशाह और मम्मी है ममता की मूरत और बन गया बापू खलनायक, और एक समय के बाद बाप मान भी लेता है " जी हां मई हूँ खलनायक". 

महामारी ने बदला बाप का स्वरूप 

अब बात करते है कुछ सकारत्मक, कोरोना के आने से बाप को घर से काम करने की आजादी मिली, जो २ से ३ घंटे सफर में लगते थे वो बचे, आने जाने से जो थकान होती थी वो बची, प्रोजेक्ट और खर्चे दोनों कम होने से काम का बोझ भी कम हुआ, पुरे दिन घर पर रहने से बीच बीच में बच्चो से बाते भी करता रहा, अब बच्चे बोर न हो तो कुछ चीजे यूट्यूब पर देख कर बना कर बच्चो को खिलाई, और ऐसे बच्चो और बाप के बीच की दूरिया कम होती चली गयी, घर से कमाई होने से समय बचने लगा जिसे उसने बच्चो के साथ जिया दिल खोल कर जिया।  

कुछ पिता लोगो ने घर के काम में पत्नी का हाथ भी बटाया जैसे बर्तन धो दिए, पौछा लगा दिया, बच्चो को नहला दिया, उनका होमवर्क करवा दिया, इन सबने बच्चो के मन से पिता एक खलनायक और तानाशाह होता है की छवि को धूमिल कर दिया या यु कहे एक नए पिता से बच्चो को मिलाया, और ये सच है जितना समय माँ अपने बच्चो को दे पाती है उतना एक पिता कभी नहीं दे पाया, इसीलिए एक व्यक्ति जब तक पिता नहीं बनता उसे लगता है की माँ ही ममता की मूर्त है बाप तो ऐवयीं है, खैर अब समय है एक पिता को बच्चो के नजदीक जाने का जिससे बच्चो को पता चले की पिता भी उनसे उतना ही प्रेम करता है जीतना माँ करती है। 

Thursday, June 17, 2021

भारतीय राजनीति में भक्ति काल

 जैसा की हम सब जानते है वर्तमान में कुछ शब्द बहुत ज्यादा प्रचलन में आये है, जैसे भक्त, मोदी भक्त, अंधभक्त इत्यादि इत्यादि, वास्तव में अगर आपको ये नजर आ रहे है तो बहुत बढ़िया और अगर अभीतक नजर नहीं आये है तो जल्दी ही आ जायेगे क्युकी ये शब्द नए नहीं है, वल्कि 2014 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके समर्थको के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला वहुप्रचलित शब्द है, अब आपके मन में ये प्रश्न उठना उतना ही जरुरी है है जैसे बोर्ड की परीक्षा पास होने के बाद मिठाई का बांटा जाना की आखिर भक्त शब्द ही क्यों इस्तेमाल किया गया, चमचा, गुलाम जैसे शब्द क्यों नहीं प्रयुक्त किये गए, तो आईये इसपर थोड़ा प्रकाश डालने के लिए आपको 2014 के चुनाव के समय में लिए चलते है। 



क्या था 2014 के चुनाव में विशेष जो हम नहीं देख पाए ?

२०१४ की बात करने से पहले हमे मोदी जी के व्यक्तित्व को जान लेना बहुत जरुरी है, और उनके विपक्ष की मानसिकता हो, मोदी जी जितने भी समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे बेदाग रहे, कोई गवन घोटाला नहीं, कोई संपत्ति का अर्जन नहीं, माने तो एक संत की तरह रहे जिनका उद्देश्य अपने राज्य के प्रत्येक नागरिक को शिक्षित, सुरक्षित और समृद्ध रखना था, अब ऐसे व्यक्तित्व के समर्थक होना हर उस व्यक्ति के लिए गर्व की बात होगी जो समृध्द, सुरक्षित और शिक्षित राष्ट्र चाहता है, और यही कारण है की 2014 के चुनाव के समय हर वर्ग के लोग मोदी की तरफ आस लगाए बैठे थे की आयेगे तभी राजनीती और राष्ट्र की पुनर्प्राणप्रतिष्ठा होगी, और ज्यादातर विपक्षी लोग और राजीनीति के जानकार ये समझ नहीं पाए की देश की जनता को आखिर हो क्या गया है, पुरे देश के लोग मोदी की शक्ल पर वोट दे रहे थे उनको मतलब ही नहीं था की कौन खड़ा है उनके क्षेत्र से, यहाँ तक की अमेठी और रायबरेली जैसी सीटों पर मार्जिन से जीते है, समाजवादी पार्टी के सिर्फ परिवार के लोग जीते है, बसपा के लोगो की जमानत जप्त आप के लोगो की जमानत जप्त ये हाल था। 

नेताओ के अनर्गल बयान 

मोदी जी के एक छवि बहुत साफ और बेदाग थी, दूसरे उनके राज्य में लॉ एंड ऑर्डर की समस्या नहीं थी, पुरे एक साल चुनाव प्रचार में लगे होने के बाद भी राज्य का सिस्टम इतना मजबूत था की कोई दिक्क्त नहीं हुयी, जिसे पूरा देश देख रहा था, बाबजूद इसके एक नेता कहते है की मोदी को वोट देने वालो को समंदर में डूब मरणा चाइये (फारुख अब्दुल्ला),  एक नेत्री कहती है की मोदी मौत का सौदागर है (सोनिआ गाँधी), और भी न जाने कैसे कैसे आरोप लगे, लेकिन मोदी ने किसी को पलट कर उत्तर नहीं दिया, २००२ में जो दंगे सावरमती एक्सप्रेस में आग लगने के बाद हुए उसके लिए मोदी जी को सबने दोषी ठहराया लेकिन सुप्रीम कोर्ट से उनको निर्दोष साबित किया गया और गुजरात की तत्कालीन राजयपाल कमला बेनीवाल ने हद ही कर दी, लेकिन फिर भी मोदी ने पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए कभी उनपर आरोप नहीं लगाया जैसा की आज ममता बनर्जी लगा देती है, नेताओ के बकवास पूर्ण बयानों का मोदी ने कभी उत्तर नहीं दिया, जनता को ये भी दिखा, और जिओ के आने से इंटरनेट पर प्रचार और प्रसार भी बढ़ा जिससे लोगो को मोदी और अन्य नेताओ के व्यक्तिगत व्यक्तित्व का आंकलन करने में बहुत आसानी हुयी, और जनता ने मोदी जी को चुना। 

भारतीय राजनीती में भक्तिकाल का उदय 

हमारा महत्वपूर्ण प्रश्न यही था की क्यों मोदी समर्थको को भक्त, अंधभक्त, मोदीभक्त की संज्ञा दी जाने लगी, बात कुछ ऐसी रही की जब मोदी के बारे में लोगो ने जाना और समझ में आया तो उनको बहुत आश्चर्य हुआ की राजनीती में और मुख्यमंत्री रहने के बाद भी कोई ख़ास संपत्ति नहीं, यहाँ तो प्रधान जी भी ४ तल्ले का मकान और गाड़िया खड़ी कर लेते है, ये कैसे इतने बेदाग रह गए, तो लोगो के अंदर उनको और जानने की उत्शुकता हुयी और इंटरनेट मुफ्त या सस्ता होने के कारण सब सामग्री जल्दी ही मिलने लगी, तो जो भी जुड़ा वो भावनाओ के साथ जुड़ा, अन्य नेताओ की लूट परम्परा से दुखी होकर जुड़ा जिसे मोदी से अलग कर पाना सम्भव नहीं था, अब विपक्ष के बौद्धिक प्रकोष्ठ ने दिमाग लगाया की अगर मोदी समर्थको के अहम् यनि की स्वाभिमान को चोट पहुचायी जाय तो शायद ये छोड़ दे मोदी को और हमारा वोट बैंक तो सॉलिड है ही तो हम जीत जायेगे और मोदी गए, तो उन्होंने भक्त शब्द को मार्किट में उतारा, हम और आप किसी के भी कितने ही समर्थक या समर्पित क्यों न हो ईश्वर के अलाबा किसी और के भक्त बनना स्वीकार नहीं करेंगे, यही विपक्ष ने भी सोचा लेकिन वो सफल नहीं हुए। 

भक्त शब्द का जादू क्यों नहीं चल पाया 

इंटनेट की सर्वसुलभता के कारण जैसे ही भक्त शब्द का प्रादुर्भाव हुआ वैसे ही समर्थको ने उसको भाँप लिया की ये शब्द उनको स्वाभिमान को ठेस पहुचाने के लिए बहुत ही मनोवैज्ञानिक तरीके से गठित किया गया है और इसे इग्नोर यानि उपेक्षित करने में ही भलाई है, क्युकी कहने वाले का व्यक्तिव भी मायने रखता है, जैसे मुझे एकबार एक लड़के ने बोला की असल बाप के हो तो यही खड़े रहना तो मेने पलट कर बोला की में तो खड़ा रहुगा पर क्या तुम खड़ा रह सकेगा मेरे साथ तो वो भाग गया, ऐसे ही जब भक्त शब्द आया तो सबसे पहले ये खोजा गया की इसके फैलाने वाले कौन लोग है, मतलब भवनाओ से भरे हुए निस्चल,निष्कपट निष्काम लोग या फिर छल कपट और राजनीती से प्रेरित लोग है, तो खोजबीन से पता चला की ये कॉग्रेस आपिये सपीए, बापिये जैसे लोगो की चाल है और मोदी समर्थको ने इस शब्द को उपेक्षित किया। 

और भी नीचे गिर गया विपक्ष 

जब भक्त शब्द कोई ख़ास कमाल नहीं दिखा पाया यानि की मोदी समर्थको को नहीं डिगा पाया तो उसको थोड़ा और स्पस्ट किया और लाये मोदी भक्त, लेकिन तब तक जनता विपक्ष का ड्रामा जान गयी थी तो इसको भी उपेक्षित किया, जब इससे बात नहीं बनी तो लाये अंधभक्त लेकिन जब शब्द द्वेष , घृणा और राजनीती से प्रेरित होते है तो वो अपनी गरिमा खो देते है और साथ ही इन शब्दों को विकसित करने वाले लोग भी अपनी गरिमा खो देते है, जनता की नजरो से गिर जाते है, और यही हो रहा है। 

Wednesday, June 16, 2021

हमे गुस्सा क्यों आता है

 हम अक्सर अपने आस पास के लोगो से सुनते है की इसको बहुत गुस्सा आता, वो बहुत गुस्सा करता, इसे बात बात पर गुस्सा आता है, ये दिनभर गुस्से में रहता है बगैरह बगैरह सुनने को मिलता है, और सच तो ये है की दुनिआ में कोई भी व्यक्ति बिना गुस्सा किये रह नहीं सकता है, क्युकी गुस्सा हमारे जीवन का अंग है, वास्तव में जब हम गुस्सा होते है तो सबसे ज्यादा एकाग्र होते है, ये बात शायद बहुत ही कम लोगो को पता होगी, गुस्से में हमारे एकाग्रता सबसे ज्यादा होती है और उस समय दिल, दिमाग और जबान तीनो एकदूसरे के साथ सबसे बेहतर तालमेल में होते है, यही कारण है इस बात को हम सामान्यतया नहीं समझा पाते है वो गुस्से में सामने वाले को बड़ी आसानी से समझ में आ जाती है, अब सवाल ये उठता है की लोग गुस्सा क्यों करते है, वो करते है या आ जाती है, ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलु है। 

गुस्से आने का कारण 

जब हम सुबह उठते है तो हमारा दिमाग पुरे दिन का न एक रोड मेप बना देता है, और कई बार ये हमे पता नहीं होता है, जैसे उठने के बाद हम ये करेंगे वो करेंगे, इससे मिलेंगे उससे मिलेंगे, अब अचानक से हमे पता चला की हमारी कार का पहिया पंचर हो गया तो हमको सबसे पहले गुस्सा आएगा, फिर हम उस गुस्से को कही निकालेंगे भले ही टायर को एक लात मार कर बोले की इसे भी आज अभी ही पंचर होना था, और जैसे ही गुस्सा निकलता है हमे हल भी दिखने लगते है पहला खुद स्टपनी बदल दे या फिर किसी मैकेनिक को बुलाये, लेकिन इन ३० से ५० सेकंड में हमको गुस्सा जरूर आएगा, अब सवाल ये उठता है की जब इसका हल इतना आसान था तो गुस्सा क्यों आया, इसे आप ऐसे समझिये की आप घर में अकेले है और रात का समय है और लाइट चली गयी, तो तत्काल आपको दिखना बंद हो जायेगा, लेकिन २० से ४० सेकंड में धीरे धीरे आपको सब दिखने लगेंगे, लेकिन वो २० से ४० सेकंड आपको परेशान कर देंगे लेकिन जब दुबारा लाइट जाएगी तो आप इतने परेशान नहीं होंगे अगर आपका दिमाग पिछली घटना से कुछ सीख पाया। 



तो गुस्सा आने का मुख्य कारण है हमे अपनी समस्या समाधान की शक्ति का पता न होना, हमे ऐसा लगना की सब खत्म, अब हम कुछ नहीं है, जिसकी बजह से हम कुछ थे वो खत्म और हम निष्प्राण और निश्तेज हो गए, तो सबसे पहले हमे हर स्थिति में ये याद रखना चाहिए की अगर समस्या है तो उसका समाधान भी होगा, बस मन को एकाग्र करके सोचना है की क्या हल हो सकता है। 

हमे गुस्सा किसके ऊपर आता है 

ये एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है, क्युकी हम सबके ऊपर गुस्सा नहीं कर सकते है, या अगर आता भी है तो छुपा लेते है, ये क्षमता है हमारे दिमाग में, उसे पता है किस पर गुस्सा करने से तत्काल नुकशान है और किस पर गुस्सा करने से कोई नुकशान नहीं है और किस पर गुस्सा करने से उसके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, जैसे हम जब किसी ऑफिस के अंदर काम के लिए जाते है और उसको करने वाला काम न करके उसे टालता है तो हमे अंदर से गुस्सा आता है लेकिन हमारा दिमाग हमे रोक लेता है की गुस्सा किया तो काम ख़राब हो जायेगा, लेकिन अगले ही पल आपको पता चलता है की जिससे आप इतने विनम्र होकर बात कर रहे है उसके हाथ में कुछ नहीं है, अब ऑटोमेटिक है बस प्रोसेस आपको ऑनलाइन पूरा करना है, तो ऐसा होते ही आप उसके ऊपर अपनी भड़ास निकाल देंगे क्युकी आपको पता है ये आपका कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। 

इसके अलाबा हमे गुस्सा उनके ऊपर आता है जो हमारे इतने करीब होते है की हमे उम्मीद होती है की वो हमारे बिना बोले ही हमे समझ जायेगे या अगर हमे परेशान है तो हमसे प्रेम से बोलेगे हमारा दर्द बांटेगे, और किसी कारण से जब ये हमारे अपने हमे नहीं समझ पाते है तो हमे घनघोर गुस्सा आता है, और हम समान तोड़ सकते है, खाना नहीं खायेगे ऐसा बोल देते है, क्युकी दिमाग हमे कहि न कहि हवा दे रहा होता है की ये तेरे अपने है तुझे १०० बार मनाएंगे और तुझे खाना खिलाये बिना खुद नहीं खायेगे, और तेरा बुरा तो ये सोच भी नहीं सकते है, ये हवा इतनी सॉलिड अकड़ देती है हमे की हमे परवाह नहीं होती की हम सही गुस्सा हो रहे है या गलत, और ऐसे में अगर घर के सदस्य न मनाये और खुद खाना खा ले तो दुःख, घृणा और बेगानापन पनपने लगता है जो आगे चलकर हमे सबसे दूर कर देता है। 

गुस्से से कैसे बचे 

बहुत से लोग इस प्रश्न का अपने अपने तरीके से हल बताते है, लेकिन वास्तव में गुस्से से बच कोई नहीं सकता है, हा इतना जरूर होता है की आप गुस्से को अपने नियंत्रण में कर बजाये आप गुस्से के नियंत्रण में जाने के, और इसमें हमारे दिमाग की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जैसे कई बार हमे गुस्सा आया और कोई सामान तोड़ दिया, लेकिन अगले २० सेकंड में हमे अहसास भी हो गया की हमने नुकशान कर दिया, बस तो दिमाग को इतना ट्रेंड करना है की घटना घटने से पहले नुकशान का आंकलन करके हमे गुस्से के अधीन होने से पहले गुस्से को हमारे अधीन कर दे, क्युकी हमने आपको शुरू में बताया था की दिमाग पुरे दिन का ही नहीं हर घटना का भी हर बार एक इकोसिस्टम बना कर चलता है, की किस पर गुस्सा करनी है किस पर नहीं करनी है, कितनी करनी और कितनी देर करनी है। 

कुछ लोगो को बात बात पर गुस्सा आता है, क्यों ?

कुछ नहीं बहुत से लोग है, इसके कई कारण हो सकते है, लेकिन सबसे सही जो मुझे लगता है की हमारा दिमाग हमसे खेल रहा होता है, मतलब हमे हमारा दिमाग नियंत्रित क्र रहा होता है, वो एक इकोसिस्टम बना कर हमे दिखा देता है, और डर बैठा देता है की अगर ये ऐसे नहीं हुआ तो आपका अस्तित्व खतरे में है, जैसे आपने कहा चाय पिने का मन है और दूसरे ने बोल दिया नहीं कॉफी, तो यहाँ गुस्सा आ जायेगा क्युकी आपका दिमाग आपको डरा देगा की अगर आज कॉफ़ी बन गयी तो आपकी कद्र कम है, तो ये एक छोटा उदाहरण है, ऐसे ही कई कारण होंगे की किसी ने आपकी बात नहीं मानी, बात काट दी, आपकी कार पार्किंग में अपनी कार लगा दी इत्यादि इत्यदि। 

बात बात पर आने वाली गुस्सा से कैसे बचे 

जैसा की हमने बताया की दिमाग एक इकोसिस्टम डवलप करता है, जिसमे वो हमे हमारे अस्तित्व के प्रति संवेदनशील बना देता है, साथ ही हमे ये भी अहसास दिला देता है की अगर इससे अलग कुछ हुआ तो में यानि दिमाग संभाल नहीं पायुगा और सबसे सुलभ मार्ग ये है गुस्सा करके चिल्ला कर मामला जल्दी खत्म करो क्युकी मेरे पास इतनी ऊर्जा नहीं है की ज्यादा देर तक बहस कर सकू या किसी बात समझ या समझा ससकू, लेकिन वास्तव यहाँ हमारा दिमाग खेल रहा होता है हमसे, हमारे पास अगर गुस्सा होने की क्षमता है तो समझ लो ऊर्जा है की हम समझ भी सके और समझा भी सके, लेकिन उसके पहले हमे अपना नियंतृण दिमाग पर करना होगा जिससे ये घबरा कर हमे व्याकुल और आशाहीन न कर दे, रस्ते बहुत है लेकिन दिखेंगे तभी जब हम निकलेंगे। 

दिमाग पर नियंत्रण कैसे करे 

बहुत आसान है, आप दिमाग को किसी न किसी सकारत्मक काम ले लगाए रहो, जैसे पढ़ते रहो, योगा करो, व्यायायम करो, पजल सॉल्व करो, कुल मिलाकर दिमाग को अपना कारिंदा समझ कर किसी न किसी काम में लगाए रखो, और साथ ही बोलने की प्रैक्टिस करते रहो जिससे आपको विस्वास हो जाए की आप बोल कर समझा सकते हो, क्युकी कई बार दिमाग ये भी पाशा फेकता है की आपके अंदर ज्यादा बोलने की ऊर्जा नहीं है, आपकी आवाज फट जाएगी इसलिए बेहतर है गुस्सा करो और घंटो का काम मिनटों में निपटाओ  

Saturday, June 5, 2021

Twitter's hypocrisy over freedom of expression

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबके लिए है, पुरे संसार में छद्म उदारवादी लोग इसकी वकालत करते है, लेकिन करते सिर्फ तबतक ही है जबतक आप हिंदुत्व, भारतीय परम्पराओ के विरुद्ध बोलो या फिर इस्लाम के नाम पर जितना भी आतंक फैलाया जा रहा है उसके विरुद्ध न बोलो, अगर आपने हिंदुत्व या भारतीय परम्पराओ पर हो रहे हमले के विपक्ष में कुछ बोल दिया तो वही आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अंधविस्वास घोषित कर दी जाएगी या फिर रूढ़िवादी सोच, और अगर ये हमला इस्लामिक सोच के कट्टर लोग कर रहे है आपने विरोध कर दिया तो आपकी तो सुनवाई होनी नहीं वल्कि आपके ऊपर ही आरोप लग जायेगा एंटी मुस्लिम होने का इस्लामोफोबिया से ग्रस्त होने के या फिर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का, मतलब मूल में ये है की कुछ भी होता रहे हिंदुत्व का साथ मत दो और इस्लामिक कट्टरपंथ पर कुछ मत बोलो। 

अब हम बात शुरू करते है एक यहूदी महिला के ट्विटर अकाउंट की जिसे २०१८ में सिर्फ इसलिए बंद  कर दिया था क्युकी उसने 2018 में मिनेसोटा की रिप्रेजेंटेटिव इल्हान ओमर को 'एंटी-यहूदी' बताया था, और आप गौर से देखेंगे तो ऐसे आरोप भारत में मोदी जी पर तब से लग रहे है जब से वो प्रधानमंत्री बने है लेकिन ट्विटर ने किसी का अकॉउंट बंद नहीं किया, जैसे हम शुरू करते है नाम से हिन्दू काम से एंटी - हिन्दू कनहिया कुमार से जिनका अकाउंट २०१४ में ही बना है और बनाया भी सिर्फ बीजेपी, आरएसएस और मोदी जी को टारगेट करने के लिए, एक ये पोस्ट देखिये :


अब अगर देखा जाए तो ये पोस्ट भी और अकाउंट भी बेन होना चाहिए क्युकी आप प्रधानमंत्री पर आरोप लगा रहे हो, भले ही यहाँ आप धर्म की जगह व्यक्तिओ के समूह के खिलाफ बनाया है उनको, लेकिन कही न कही जनता तो दोनों ही है। 

जैसा की हम सब जानते है और आप भी जानते है की, भगवान श्री राम हिन्दुओ के आराध्य है, और दिनचर्या में राम न म हम सभी लेते है, तो कन्हइया कुमार का विशुद्ध हिन्दू धर्म का विरोधी ट्वीट देखिये, 

लेकिन न ये आकउंट बेन होगा न ट्वीट डिलीट होगा क्युकी ये तो हिन्दू धर्म पर तंज है इस्लाम पर होता तो अब तक सब बंद कर दिया गया होता, अब अगला ट्वीट सीधा संघ पर यानि की आरएसएस पर निशाना है, वही आरएसएस है जिसने कभी कहि बम्ब नहीं फोड़ा, कही कर हुए हमले में शामिल नहीं हुआ, बस एक सेवा भाव है उसके खिलाफ देख लीजिये 



चलिए तो बात हो गए जो नाम से हिन्दू है लेकिन नफरत हिंदुत्व से बहुत गहरी है, आखिर वामपंथी है तो इनके आदर्श भारतीय तो हो नहीं सकते है, और जो भारतीय नहीं हो उससे भारत के प्रति प्रेम की आशा करना व्यर्थ है, अब कुछ ट्वीट ऐसे लोगो के जो इसराइल के खिलाफ है लेकिन न इनका अकाउंट बंद हुआ, न ब्लू टिक गया न ही ट्वीट डिलीट हुआ, आखिर ये कैसा उदारवाद है 


एक तो इनसे भी आगे निकल गए, वो बॉन्ड की लिस्ट डाल रहे है और अपने समुदाय से अपील कर रहे है वहिष्कार करने की, और उनके समुदाय के लोग साथ भी है, लेकिन ये भी अकाउंट बेन नहीं होगा, न ब्लू टिक गया न ट्वीट डिलीट हुआ, अब सोचिये कितने दोगले मानक है टवेटर के 


जबकि एक महिला का ट्विटर अकाउंट २०१८ में सिर्फ एक लाइन लिखने पर बेन हो गया है, और इनके अकाउंट शान से चल रहे है, वैसे एक दलीप मंडल भी है वो भी हिन्दू धर्म के खिलाफ गजब का जहर उगलते है लेकिन उनका भी ट्वटिर बहुत धूमधाम से चल रहा है, देखिये इनका भी सीधा जाति पर हमला, यही अगर कोई दलित जाति के लिए कह दे तो ?

इनको सही मायने में सवर्णो से नफरत है, जो स्पस्ट झलकती है, देखिये इस ट्वीट को और सोचिये क्या विचारधारा का व्यक्ति है, 


सोचिये, लोग हिन्दू धर्म के खिलाफ है उनके अकाउंट मस्त चल रहे है, सवर्णो के खिलाफ जहर उगल रहे है उनके अकाउंट मस्त चल रहे है, भारत और प्रधानमंत्री के खिलाफ जहर उगल रहे है उनके अकाउंट धूमधाम से चल रहे है, लेकिन अगर आप आरएसएस या बीजेपी के साथ है, हिंदुत्व और सवर्णो के हित की बात करेंगे तो ट्वीट भी डिलीट होगा, ब्लू टिक अगर है तो वो भी चला जायेगा और अकाउंट भी बेन क्र दिया जायेगा, जैसा कंगना रनौत के साथ हुआ, मोहन भागवत के साथ हुआ और न जाने कितने लोग है इस लिस्ट में, जागो और जगाओ। 










Saturday, May 22, 2021

शयन के जरूरी नियम

1. सूने तथा निर्जन घर में अकेला नहीं सोना चाहिए। "देव मन्दिर" और #श्मशान में भी नहीं सोना चाहिए - "#मनुस्मृति"
2. किसी सोए हुए मनुष्य को *अचानक* नहीं जगाना चाहिए - "#विष्णुस्मृति"
3. विद्यार्थी, नौकर औऱ द्वारपाल, यदि ये अधिक समय से सोए हुए हों, तो *इन्हें जगा* देना चाहिए - "#चाणक्यनीति"



4. स्वस्थ मनुष्य को आयुरक्षा हेतु #ब्रह्ममुहुर्त में उठना चाहिए। *(देवीभागवत)* बिल्कुल *अँधेरे* कमरे में नहीं सोना चाहिए - "#पद्मपुराण"
5. *भीगे* पैर नहीं सोना चाहिए। *सूखे पैर* सोने से लक्ष्मी (धन) की प्राप्ति होती है। *(अत्रिस्मृति)* टूटी खाट पर तथा *जूठे मुँह* सोना वर्जित है - "#महाभारत"
6. "नग्न होकर/निर्वस्त्र" नहीं सोना चाहिए -"#गौतम_धर्म_सूत्र"
7. पूर्व की ओर सिर करके सोने से #विद्या, पश्चिम की ओर सिर करके सोने से *प्रबल चिन्ता*, #उत्तर की ओर सिर करके सोने से *हानि व मृत्यु* तथा #दक्षिण की ओर सिर करके सोने से *धन व आयु* की प्राप्ति होती है - "आचारमय़ूख"
8. दिन में कभी नहीं सोना चाहिए। परन्तु "#ज्येष्ठ_मास" में दोपहर के समय 1 मुहूर्त (48 मिनट) के लिए सोया जा सकता है। (दिन में सोने से रोग घेरते हैं तथा आयु का क्षरण होता है)
9. दिन में तथा *सूर्योदय एवं सूर्यास्त* के समय सोने वाला रोगी और दरिद्र हो जाता है - "#ब्रह्मवैवर्तपुराण"
10. सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घण्टे) के बाद ही शयन करना चाहिए।
11. बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर है।
12. दक्षिण दिशा में *पाँव करके कभी नहीं सोना चाहिए। यम और दुष्ट देवों* का निवास रहता है। कान में हवा भरती है। *मस्तिष्क* में रक्त का संचार कम को जाता है, स्मृति- भ्रंश, मौत व असंख्य बीमारियाँ होती है।
13. हृदय पर हाथ रखकर, छत के "पाट या बीम" के नीचे और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।
14. शय्या पर बैठकर "खाना-पीना" अशुभ है।
15. सोते सोते "पढ़ना" नहीं चाहिए। (ऐसा करने से नेत्र ज्योति घटती है )
16. ललाट पर "तिलक" लगाकर सोना "अशुभ" है। इसलिये सोते समय तिलक हटा दें।
इन १६ नियमों का अनुकरण करने वाला यशस्वी, निरोग और दीर्घायु हो जाता है।
नोट :- यह सन्देश जन जन तक पहुँचाने का प्रयास करें। ताकि सभी लाभान्वित हों