जब देश स्वतंत्रत हुआ तो बहुत से बुद्धि जीविओ ने विचार किया की एक बहुत बड़ी आबादी पुरे स्वतंत्रता संग्राम में निष्क्रिय रही! लेकिन क्यों रही ? इस सोच विचार में उन्होंने पाया की शायद अशिक्षा और उपेक्षा इसका एक कारन रहा है, उनको हम लोग साथ लेकर नहीं चले, ये एक नैतिकता के आधार पर आत्मग्लानि हुयी जो शायद उस समय उत्कृस्ट सोच का उद्दाहरण था और उन्होंने आरक्षण जैसा प्रावधान लाकर उनको मुख्य धारा में जोड़ने का प्रयास किया की अब देश के विकास में हम और ये दोनों लोग मिलकर काम करेंगे और देश का विकास करेंगे, और इसके लिए हमारे सवर्ण पूर्वजो ने इतिहास को खंगाल कर कुछ इस बहुसंख्यक आबादी के कुछ महापुरष निकाले जिन्होंने शिक्षा और समाज के लिए कुछ छोटा मोटा योगदान तो दिया लेकिन वास्तव में वो खुद को श्रेष्ठ बनाने का उनका शॉर्टकट उपाय था फिर भी उनकी अच्छी बातो की कहानिया बना कर इस विशाल जनसमुदाय को समझने और समझाने के प्रयास किया की मेहनत करो, सकारत्मक सोचो और आगे बढ़ो।
लेकिन जैसे ही इस समुदाय को अपनी जाति के महापुरुष मिले, उनके लिखे कुछ वांगमय, उनके कुत्षित विचारो का पुलिंदा मिला इन लोगो ने बजाये देश को आगे बढ़ाने और मुश्किलों से मिलकर लड़ने के बजाये, उन्ही के वंशजो से लड़ना शुरू जिन्होंने इनके पूर्वजो को जीने की राह बताई।
यानि अपना भी टाइम बर्बाद करने लगे क्युकी अब आरक्षण एक्ट और अन्य सरकारी सुविधाओं ने इनके लिए सब चीजे सुलभ कर दी, तो अब बुरी इनकी नजर हमारी बहिन बेटिओ पर पड़ने लगी, और जब विरोध हुआ जो की होना था तो शुरू हो गए हमको अछूत समझते है, हमारे साथ रोटी बेटी का रिश्ता नहीं रखना चाहते है, इत्यादि इत्यादि।
अब यहाँ से इनके कुविचारों ने एक समस्या खड़ी कर दी जिसने सोचने को मजबूर किया की क्या इनको शिक्षा से दूर रखना और उपेक्षित रखना ज्यादा सही था ? क्युकी हमारे पूर्वजो के लिए, धर्म, परिवार की मान मर्यादा और आत्मोन्नति यही तीन महत्वपूर्ण थे, और इनको शिक्षा देकर बजाये देश और समाज का फायदा होने के व्यर्थ का संघर्ष रूपी नुकशान होने लगा।
आज कुछ नहीं तो मनुस्मृति जला रहे है, भगवान श्री राम और कृष्ण के कर्मो पर ऊँगली उठा रहे है, श्री रामचरित मानस को गलत बता रहे है, और उम्मीद करते है की ऐसी सोच विचार वाले लोगो के साथ सनातनी लोग सम्मान से पेश आये, क्युकी ये लोग महान ज्यादा है।
विचार करिये, एक व्यक्ति जो २२ प्रतिज्ञा करता हो की में उसमे से कुछ कुछ नहीं करुगा और दूसरे लोग जो अपने जीवन में वही कुछ कुछ को अपना जीवन का आधार मानते हो उनमे और उनके अनुयायिओं में कैसी समानता ?
फिर आरक्षण मिलता रहे इसके लिए कहानिया बनाई जाने लगी, की हमे पढ़ने नहीं दिया गया ? तो प्रश्न ये है की क्या नहीं पढ़ने दिया, वेद पुराण, उपनिषद, इत्यादि लेकिन आज तो तुम उनका सम्मान करते ही नहीं हो तो पढ़ना क्यों था ? और अगर पढ़ना ही था तो अब पढ़ लो ? लेकिन पढ़ने और समझने के लिए जो सम्यक बुद्धि, ब्रह्मचर्य, तप, और शुद्ध अंतःकरण चाहिए वो कहाँ से लाएंगे ?
मंदिर में घुसने नहीं दिया तो सोचो आत्ममंथन करो की क्यों नहीं घुसने दिया ? आत्मावलोकन करो ? आज तुमको मंदिर कमाई का अड्डा दीखता है तो पहले भी दीखता होगा और कोई न कोई हरकत जरूर की होगी तब जाकर समाज ने ऐसा निर्णय लिया नहीं तो ईश्वर के मंदिर जितने मेने प्राचीन देखे है किसी में ऐसा दरवाजा नहीं था जिसमे ताला लगता हो, चलो तुमको मंदिर में तब नहीं जाने दिया लेकिन अगर ईश्वर श्रद्धा होती मिलकर मंदिर बना लेते जैसे


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